नोएडा से एक वीडियो आया-साधारण-सा पर भीतर तक झकझोर देने वाला। एक व्यक्ति अपने ₹1.5 करोड़ के फ्लैट में दीवार के सामने लकड़ी की पेंसिल रखता है। हथौड़े से हल्का-सा टैप करता है और पेंसिल दीवार में समा जाती है। न कोई ड्रिल, न कोई दबाव। बस हल्का-सा प्रहार और दीवार जैसे कागज की बनी हो। वीडियो वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर ठहाके भी लगे, तंज़ भी उड़े—
*भाई, भूकंप आए तो दो पेंसिल रख लेना—सेफ्टी के लिए।*
पर इस हँसी के पीछे एक गहरी चिंता थी ।
*क्या सचमुच हमारे शहरों की दीवारें सिर्फ दिखावे की रह गई हैं*
यह घटना किसी एक बिल्डिंग की नहीं, बल्कि उस पूरे निर्माण-तंत्र की पोल खोलती है, जिसमें ईंट, सीमेंट और स्टील से ज़्यादा ज़रूरी होता है ब्रॉशर में दिया गया व्यू और पज़ेशन डेट। बिल्डर बेचते हैं लक्ज़री का सपना और अक्सर खड़ा कर देते हैं खोखली ईंटों का महल। निर्माण-गुणवत्ता की समस्या नई नहीं है। कई शोध और इंजीनियरिंग रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में बिल्डिंग क्वालिटी गिरने के प्रमुख कारण हैं—अनुभवी मज़दूरों की कमी, निरीक्षण की लापरवाही, घटिया सामग्री और ठेकेदारी प्रणाली का शॉर्टकट-संस्कृति। कई बिल्डर हल्के वजन वाले AAC ब्लॉक्स का प्रयोग करते हैं, जो तापमान और ध्वनि के लिए तो अच्छे होते हैं पर यदि निर्माण-मिश्रण और प्लास्टर सही न दिया जाए तो दीवारें कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं।
₹1.5 करोड़ की कीमत सिर्फ लोकेशन की नहीं होती। उसमें भरोसे का मूल्य भी शामिल होता है पर जब वही भरोसा दीवार में धँस जाती पेंसिल की तरह टूटने लगे, तो सवाल सिर्फ बिल्डर पर नहीं, पूरे तंत्र पर उठता है।
* कहाँ है वो निरीक्षण प्रणाली।
* कहाँ हैं वो सर्टिफिकेट्स, जिन पर खरीदार भरोसा करे।
* क्यों हर खरीदार को खुद इंजीनियर बनकर जांच करनी पड़ती है कि ईंट असली है या दीवार नकली।
सच यह है कि आज निर्माण एक फिनिशिंग का खेल बन गया है। बाहर से चिकना, भीतर से कमजोर। पेंट चमकदार, पर परत पतली। जिप्सम से छिपा हर दोष, सीमेंट में मिली हर कमी।
खरीदार सोचता है कि ऊँची कीमत ऊँची गुणवत्ता की गारंटी है पर यह भ्रम अब बार-बार टूट रहा है। नोएडा से लेकर गुरुग्राम, पुणे से लेकर हैदराबाद तक—हर जगह ऐसी कहानियाँ हैं, जहाँ घर सिर्फ बनते हैं, टिकते नहीं। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि दीवार की मजबूती सिर्फ ईंट की नहीं होती, व्यवस्था की होती है। जब निरीक्षण ढीले हों, जब ठेकेदार की जगह दलाल तय करे कि किस सीमेंट का प्रयोग होगा, जब खरीदार को पज़ेशन देकर बिल्डर पीछे हट जाए—तब 1.5 करोड़ की दीवार भी पेंसिल के सामने हार जाती है। इसलिए अब वक्त है कि घर खरीदते समय लुक्स नहीं, लोड-बियरिंग कैपेसिटी पूछी जाए; किचन मॉड्यूलर है या नहीं से पहले यह पूछा जाए कि दीवार स्ट्रक्चरल है या सजावटी और सरकारें भी यह समझें कि रियल-एस्टेट का मतलब सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, आवास में भरोसे की बुनियाद है। एक पेंसिल का दीवार में धँसना शायद छोटा दृश्य लगे पर यह आधुनिक भारत के शहरी विकास की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है। हम ऊँचाई तक पहुँच गए हैं, पर गहराई से खोखले होते जा रहे हैं।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*