देश आज खुद को विश्व गुरु कहने की आकांक्षा रखता है। मंचों पर यह घोषणा गर्व से की जाती है कि भारत दुनिया का मार्गदर्शन करेगा लेकिन जब धरातल पर नज़र डालें, तो यह गर्व कड़वी विडंबना में बदल जाता है क्योंकि विश्व गुरु कहलाने वाला यह देश, बार-बार अपने ही सैनिकों और नागरिकों के खून से लथपथ होता जा रहा है। 2016 से लेकर 2025 तक के वर्षों में एक के बाद एक आतंकी और नक्सली हमले हुए—पठानकोट, उरी, सुजवान, पुलवामा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, गुलमर्ग और पहलगाम। हर हमले के बाद ताबूतों में लिपटे जवानों की तस्वीरें सामने आईं, राष्ट्र गूंजा शहीद अमर रहें के नारों से और फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया। सरकारों के बयान आए। हम भूलेंगे नहीं, माफ नहीं करेंगे लेकिन कुछ समय बाद नई त्रासदी उसी पुराने दर्द को ताज़ा कर देती रही। पुलवामा हमला शायद उस पीड़ा का सबसे गूंजता प्रतीक है, जब चालीस जवान एक झटके में शहीद हो गए, पूरा देश सन्न रह गया लेकिन क्या उसके बाद हालात बदले, नहीं। नक्सल प्रभावित इलाकों में अब भी सुरक्षाबलों को निशाना बनाया जाता है, सीमा पार से अब भी घुसपैठ जारी है और भीतर से भी हमारे ही अपने लोग हथियार उठाए हुए हैं। हर बार जब कोई बड़ा हमला होता है, हम बयान देते हैं कि देश आतंकवाद के सामने झुकेगा नहीं लेकिन सच्चाई यह है कि हर बार हम झुकते नहीं, सहते हैं और यही सहनशीलता अब कमजोरी लगने लगी है। विश्व गुरु वह होता है जो दिशा देता है, जो अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है लेकिन आज भारत में शौर्य और शहादत को राजनीति की भाषा में ढाल दिया गया है। जवानों की मौत पर भावनाओं का बाजार सजता है और शासन के असफल निर्णयों को राष्ट्रवाद की ओट में छिपा दिया जाता है।
इन वर्षों में न जाने कितनी माताएँ अपने बेटों की तस्वीरें लेकर न्याय की गुहार लगाती रहीं पर व्यवस्था ने उन्हें केवल आश्वासन दिया। क्या यही मजबूत शासन है ? क्या विश्व गुरु बनने का अर्थ यह है कि हम अपने ही घर में असुरक्षित रहें। सच तो यह है कि हम एक ऐसे दौर में हैं, जहाँ बयानबाजी ने नीति की जगह ले ली है। कूटनीति के नाम पर केवल कड़े शब्द हैं और सुरक्षा के नाम पर अनगिनत शहीदों व नागरिकों की सूची। अगर हम सचमुच विश्व गुरु बनना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने ही घर की सुरक्षा और अपने जवानों की गरिमा को प्राथमिकता देनी होगी। एक ऐसा देश जो बार-बार अपने ही नागरिकों की लाशों पर भाषण देता है, उसे गुरु नहीं कहा जा सकता, वह केवल शोकग्रस्त राष्ट्र कहलाता है। आज ज़रूरत है आत्ममंथन की कि क्या हम वाकई मजबूत हैं या फिर हम केवल हमले सहने में माहिर हो गए हैं। जब तक यह देश अपने ही जवानों व नागरिकों की शहादत पर राजनीति करता रहेगा, तब तक विश्व गुरु का सपना केवल भाषणों में जिंदा रहेगा और ज़मीन पर बस ताबूतों की गिनती बढ़ती रहेगी।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*