काठमांडू/दिल्ली (रविन्द्र आर्य): नेपाल के पूर्व राजा श्री महाराजाधिराज ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाहदेव ने विजयादशमी (दशैँ) पर्व के अवसर पर समस्त नेपाली जनों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा है कि यह पर्व केवल आस्था और परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता और समृद्धि की रक्षा का संकल्प है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि दुर्गा भवानी की पूजा-आराधना और पारिवारिक मिलन का यह पर्व नेपाली समाज को शक्ति, शांति और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का प्रेरणा-स्त्रोत है। यह अवसर नेपाली जनों को आत्मबल, आत्मसम्मान और राष्ट्रवादी सोच को सुदृढ़ करने का आह्वान करता है। पूर्व राजा ने स्पष्ट किया कि नेपाल हमेशा से स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र रहा है और भविष्य में भी उसे भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद अपनी राह स्वयं तय करनी होगी। उन्होंने युवाओं को नई सोच, नवाचार और ऊर्जा के साथ आगे आने का आह्वान किया तथा राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाने पर बल दिया। अपने संदेश में उन्होंने कहा—"यह समय हमें सत्य, धर्म और परंपरा के साथ राष्ट्रप्रेम व अनुशासन बनाए रखने की सीख देता है। जो बीत गया, वह बीत गया। अब हमें नई ऊर्जा, उत्साह और दृष्टिकोण के साथ एकजुट होकर राष्ट्र के लिए खड़ा होना होगा।" ज्ञानेन्द्र शाह ने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक युग की प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ और सामाजिक संस्थाओं की मजबूती ही नेपाल को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाएँगी। उन्होंने नेपालियों से अपील की कि वे आपसी सद्भाव और विश्वास बनाए रखते हुए एक सभ्य, अनुशासित और जिम्मेदार नागरिक समाज के निर्माण में योगदान दें। अंत में उन्होंने माँ भगवती से प्रार्थना की कि वह नेपाल की एकता और प्रगति के मार्ग को दृढ़ बनाए रखें। विजयादशमी के अवसर पर आया यह संदेश नेपाली समाज को न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से जोड़ता है बल्कि राष्ट्रीयता, एकता और भविष्य के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की भी याद दिलाता है।
*"धर्म, राष्ट्र और एकता—यही है विजयादशमी का संदेश"*