हिंदू राष्ट्र की मांग और गऊ माता की अस्मिता: नेपाल का निर्णायक मोड़

AYUSH ANTIMA
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काठमांडू /दिल्ली: म्यांमार के बौद्ध भिक्षु असीन विराधू को कभी टाइम्स मैगज़ीन ने “Face of Buddhist Terror” कहकर कवर पेज पर प्रस्तुत किया। यह पश्चिमी डीप-स्टेज लॉबी का प्रोपेगेंडा था, जिसने आत्मरक्षा को आतंकवाद का नाम देकर बौद्ध समाज को ही दोषी ठहराने की कोशिश की। वास्तविकता यह है कि विराधू ने अपने देश की अस्मिता बचाने के लिए उन ताक़तों के खिलाफ आवाज़ उठाई, जो रोहिंग्या मुस्लिमों की आड़ में म्यांमार की शांति और संस्कृति को अस्थिर कर रहे थे। उन्होंने बौद्ध धर्म और राष्ट्रहित की रक्षा को जीवन का लक्ष्य बनाया और शांति, सुरक्षा एवं अस्तित्व के संघर्ष में आइकोनिक मैन के रूप में उभरे। यह उदाहरण आज केवल म्यांमार तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत और नेपाल जैसे सनातन राष्ट्रों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।

*भारत और नेपाल का सांस्कृतिक संकट*

भारत और नेपाल आज ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ उनकी सनातन पहचान और धार्मिक अस्मिता पर सीधा आघात हो रहा है। भारत में धीरेंद्र शास्त्री जैसे संत खुलकर हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहे हैं। नेपाल में भी राजशाही की पुनर्स्थापना और हिंदू राष्ट्र की मांग जनता के बीच तेज़ी से बढ़ रही है। नेपाल की सबसे बड़ी पहचान उसकी गऊ माता है। गऊ माता केवल राष्ट्रीय पशु नहीं, बल्कि देश की आत्मा है। नेपाल के नोटों, करंसी और सांस्कृतिक प्रतीकों में गऊ माता का गौरवपूर्ण स्थान है। गऊ माता केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन का आधार भी रही है।
गोरखा परंपरा में गोरखनाथ ने "गोरखा" शब्द को स्थापित किया। इस परंपरा का मूल भाव ही गऊ रक्षा और सनातन संस्कृति की रक्षा रहा है। गोरखा सैनिकों की वीरता और उनका गाय-गोरक्षा से गहरा रिश्ता, नेपाल की अस्मिता का प्रतीक है। लेकिन दुर्भाग्य से आज यही अस्मिता खतरे में है।

*गृह मंत्री पर विवाद और गाय की अस्मिता*

कुछ वर्ष पहले नेपाल के वर्तमान गृह मंत्री ओम प्रकाश आर्यल ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका डाली कि गाय की हत्या पर सज़ा कम की जाए और राष्ट्रीय पशु का दर्जा समाप्त हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि गऊ माता नेपाल की आत्मा है। इसके बावजूद आज वही व्यक्ति गृह मंत्री की कुर्सी पर है। यह स्थिति केवल विरोधाभासी नहीं बल्कि गहरी साजिश की ओर इशारा करती है। नेपाल के पूर्वी क्षेत्रों में स्थित शहर धरान (Dharan) में खुले आम गऊकसी होने पर जब जनता विरोध करती है, तो नेपाल की माओवादी–कम्युनिस्ट–कांग्रेस गठबंधन सरकार चुप्पी साध लेती है। पश्चिमी सेक्युलर लॉबी भी मौन रहती है। यह नेपाल के आत्म सम्मान और सांस्कृतिक विरासत के लिए गहरा खतरा है।

*गऊ माता का आध्यात्मिक और वेदांत दृष्टिकोण*

वेदों और पुराणों में गऊ माता को पवित्रतम प्राणी बताया गया है। ऋग्वेद, अथर्ववेद और महाभारत में गऊ माता की रक्षा को धर्म का सर्वोच्च कर्तव्य माना गया है।
मान्यता है कि जब मानव आत्मा मृत्यु के बाद वत्राणी नदी से गुजरती है, तब गऊ माता की पूँछ पकड़कर स्वर्ग की ओर प्रस्थान करती है। यही कारण है कि गऊ माता को “मोक्षदायिनी” कहा गया है। इसी प्रकार मेरे लिए भी गऊ माता केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि माँ के समान हैं। वही मुझे स्वर्ग का मार्ग दिखाएँगी, ना कि वे लोग जो सत्ता के लोभ में गऊ माता की अस्मिता पर प्रश्न उठाते हैं। यह नेपालवासियों के लिए भी आत्ममंथन का विषय है कि उनकी धरती पर, जहाँ देवताओं ने मानव कल्याण हेतु गऊ की उपासना स्थापित की, वहीं आज उसकी हत्या और अपमान कैसे सहा जा रहा है ? गऊ माता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी सर्वोपरि रही हैं। उनका दूध, गोबर और गौमूत्र सदियों से भारतीय और नेपाली जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। यही कारण है कि सनातन समाज ने गऊ माता की रक्षा को अपना पहला कर्तव्य माना।

*भ्रष्टाचार, साम्यवाद और विदेशी प्रभाव*

नेपाल की जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ Gen-Z आंदोलन जैसे बड़े संघर्ष किए। साम्यवादी और विदेशी प्रभाव वाली सरकारें जनता की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर, पश्चिमी ताक़तों की दलाली करती रहीं। यही कारण है कि जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

*आज नेपाल के सामने दो ही विकल्प हैं*

• अपनी सनातन अस्मिता और गऊ माता की रक्षा करते हुए हिंदू राष्ट्र और राजशाही की पुनर्स्थापना।

• या फिर विदेशी लॉबी और साम्यवादी शासन के हाथों अपनी पहचान खो देना।

*क्या नेपाल को चाहिए नया "विराधू"*

यही प्रश्न आज नेपाल की जनता पूछ रही है। क्या नेपाल को भी म्यांमार जैसे असीन विराधू की आवश्यकता नहीं है, जो सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ आवाज़ उठाए ? यह कोई बाहरी अवतार आकर नहीं करेगा। यह कार्य नेपाल की पवित्र भूमि से ही निकलेगा। चाहे वह बौद्ध हो, हिंदू हो, गोरखा हो या कोई एनिमल लवर संगठन—सभी को मिलकर गऊ माता की अस्मिता और नेपाल की आत्मा की रक्षा करनी होगी। भारत में कुछ साधु-संत समाज जागा है और गऊ रक्षा व हिंदू राष्ट्र की माँग कर रहा है लेकिन नेपाल को विशेष रूप से अपने भीतर से एक ऐसे क्रांतिकारी विराधू की आवश्यकता है, जो गऊ माता और सनातन अस्मिता की रक्षा को जीवन का लक्ष्य बनाए। आज नेपाल की पवित्र भूमि पर यह निर्णय होना है कि वह किस दिशा में जाएगा। क्या वह सनातन अस्मिता, गऊ माता और गोरखा परंपरा के साथ खड़ा होगा या फिर सेक्युलर–साम्यवादी लॉबी के दबाव में अपनी आत्मा को बेच देगा ? नेपाल की जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संघर्ष कर दिखा दिया है। अब समय है कि गऊ माता की रक्षा और सनातन अस्मिता के लिए भी उसी तरह शांतिपूर्ण, संगठित और दृढ़ संघर्ष खड़ा किया जाए। गऊ माता की अस्मिता और नेपाल का हिंदू राष्ट्र केवल नेपालियों की पहचान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के अस्तित्व का प्रश्न है। इसलिए अब नेपाल को भी अपने भीतर से ही एक नए असीन विराधू को जन्म देना होगा, जो शांति और सनातन मूल्यों के पक्ष में क्रांतिकारी नेतृत्व करे।

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