जीएसटी का बचत जश्न या लोगों की भावनाओं से खिलवाड़

AYUSH ANTIMA
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एक टैक्स एक नैशन की परिकल्पना कांग्रेस शासन की थी। शायद वह दिन माननीय प्रधानमंत्री को याद नहीं, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो इसका पुरजोर विरोध किया था। जीएसटी को शुरू में 1 अप्रेल 2010 को लागू किया जाना था लेकिन कई बाधाओं के कारण इसका कार्यान्वयन नहीं हो सका। इसको लेकर संविधान संशोधन (115वां) विधेयक 2011 में पेश किया गया था लेकिन 2014 में लोकसभा भंग होने के साथ ही यह निरस्त हो गया, तत्पश्चात 2017 में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया, जिसने भारत में जीएसटी की नींव रखी। अप्रैल 2017 में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया। आठ साल तक घरेलू वस्तुओं को सबसे उच्चतम स्लैब 18 प्रतिशत व 28 प्रतिशत में रखने के बाद सरकार को आमजन की पीड़ा का अहसास हुआ, जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है कि अब केन्द्र सरकार ने जीएसटी की 5 और 18 प्रतिशत वाली स्लैब ही रखा है। 90 प्रतिशत वस्तुएं 5 प्रतिशत टैक्स के दायरे में लाई गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे दीपावली का तोहफा करार दिया है। जैसा कि भारतीय राजनीति नई संस्कृति के दौर से गुजर रही है, राज्य सरकारें भी केन्द्र में नंबर बनाने की होड़ में जुट जाती है। जीएसटी रिफार्म के फायदों को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए राजस्थान की भाजपा सरकार ने भी अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया है। इन विज्ञापनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को महिमा मंडित करने वाले फोटो के साथ मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने भी अपनी फोटो प्रकाशित की है। पैंट बेचकर नई कमीज सिलवाना ही आजकल विकास के मापदंड हो गये है। आठ साल तक आमजन को महंगाई की चक्की में पीसने के बाद सरकार इसका जश्न मना रही है, जो हास्यास्पद ही नहीं बल्कि आमजन की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। यह कैसी विडंबना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी इस कर प्रणाली का पूरजोर विरोध कर रहे थे, आज उसी प्रणाली के फायदे गिनवा रहे हैं। यदि सचमुच में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आमजन की समस्याओं को लेकर गंभीर है तो पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में लाने का साहसिक फैसला करें और तभी इस तरह का उत्सव मनाने की सार्थकता होगी।

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