माया देखे मन खुसी, हिरदै होइ बिगास। दादू यह गति जीव की, अंति न पूगै आस।। सन्तप्रवर श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं अज्ञानी जन क्षण-भंगुर पदार्थों को देख देखकर प्रसन्न होते हैं। प्राप्त होने पर तो बहुत प्रफुल्लित होते हैं परंतु सर्वमायिक पदार्थो के मिलने पर भी उनकी तृष्णा तो शांत नहीं होती चाहे कितने ही जन्म क्यों न बीत जाए। अतः माया की आशा को त्याग कर राम के ध्यान में ही अपने मन को लगाना चाहिए। महाभारत में लिखा है कि जो मन के दास है, वह सारे संसार के दास बन जाते हैं और मन जिनका दास बन जाता है तो उसके लिए सारा संसार ही दास बन जाता है।
श्रीमदभागवत में कहा है कि सचमुच में आशा ही सबसे बड़ा दुख है और निराशा ही सबसे महान सुख है। योगवाशिष्ठ में तृष्णा लोहे की बनी हुई श्रृंखलाओं से भी भयंकर विशाल मजबूत रस्सी है क्योंकि लोह तो समय पाकर के भी नष्ट हो जाता है परंतु तृष्णा तो बढ़ती ही रहती है। मार्ककण्डेय पुराण में भोगो में आसक्ति ही उस राक्षस के समान है, जो मनुष्य को पकड़ने के बाद छोड़ता नहीं है। यह मन आशारूपी विष बेल है, जो प्राणियों को मारने वाली है और जीर्णशीर्ण मदिरा की तरह मानव को उन्मत बनाने वाली है। अतः जो मूढ़ प्राणी मायिक पदार्थो के लिये जीवन निर्वाह करते है, उनका जीवन बेकार है। विवेकी मनुष्य को अजर अमर परमात्मा का ही ध्यान करना चाहिए।