बिना सेना का सेनापति

AYUSH ANTIMA
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झुंझुनूं जिले की राजनीति को लेकर एक कहावत मशहूर है कि नेता कब पलटी मार जाए पता ही नहीं चलता। वैसे स्थानीय नेता सत्ता की मलाई खाने में ज्यादा विश्वास रखते है। जब से राजस्थान में भाजपा सरकार का गठन हुआ है, इस मलाई की चाहत ज्यादा ही बढ़ गई है। यह मलाई का ही परिणाम है कि जयपुर में सभी नेताओं ने अपने पावर सैंटर बना रखे हैं, जो संगठन में गुटबाजी को हवा देने का काम कर रहे हैं। नवनियुक्त जिलाध्यक्ष का मनोनयन होते ही उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़े हुए कि पैनल में नाम न होने के बावजूद पैराशूट जिलाध्यक्ष की नियुक्ति हुई। यह आरोप किसी दूसरे दल के नेता ने नहीं लगाए बल्कि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ने लगाए थे। उनके आरोप प्रदेश नेतृत्व को नागवार गुजरे और उनको पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया लेकिन झुंझुनूं में मची गुटबाजी को अपनी कार्यशैली से नवनियुक्त जिलाध्यक्ष लगाम लगाने में नाकामयाब रही है। इस गुटबाजी का ही कमाल है कि अभी तक संगठन की जिला अध्यक्ष टीम की घोषणा नहीं कर पाई है। वैसे बिना जिला टीम की घोषणा करने की परिपाटी चली आ रही है क्योंकि पूर्व जिलाध्यक्ष बनवारी लाल सैनी को भी बिना जिला टीम के काम करना पड़ा था और पद मुक्त भी कर दिया।
लगता है कि उनका कार्यकाल भी पूर्व सांसद की तरह अभिनंदन समारोहों में ही सिमट कर रह जायेगा। वैसे देखा जाए तो जिले मे भाजपा की स्थिति नाजुक हैं। इसका मूल कारण संगठन में मची गुटबाजी है और उसी का परिणाम विधानसभा व लोकसभा चुनावों में देखने को मिला था। झुंझुनूं उपचुनाव के परिणाम जरूर कुछ सुखद हो सकते हैं लेकिन इसमें जीत के किरदार निर्दलीय उम्मीदवार राजेन्द्र गुढा थे। किसी भी नेता को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि एक जाति के वोटों से विधानसभा या लोकसभा के दर्शन हो सकते हैं, जब तक किसी नेता पर छत्तीस कौम का आशीर्वाद न हो, वह विजय से दूर ही रहता है। नवनियुक्त जिलाध्यक्ष के समक्ष सबसे पहली चुनौती अपनी टीम बनाने को लेकर है कि किस तरह जातिगत समीकरण के साथ ही भाजपा को समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ अपनी टीम बनाई जाए। तत्पश्चात आगामी स्थानीय निकायों व पंचायतों के चुनाव उनकी परीक्षा की घड़ी होगे। सभी गुटों को एकजुट कर चुनावों में जाना उनकी क्षमता को प्रदर्शित करने का अवसर होगा। अब आगामी चुनाव ही इस बात का निर्धारण करेगे कि प्रदेश नेतृत्व का फैसला कितना उचित था।

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