गऊ माता पर प्रहार करने वाला अब नेपाल का होम मिनिस्टर: जनता का गुस्सा चरम पर”

AYUSH ANTIMA
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काठमांडू/नेपाल: नेपाल की राजनीति एक बार फिर संकट और विरोधाभास के दौर में पहुँच गई है। संसद भंग होने के बाद अंतरिम व्यवस्था के तहत ओली सरकार के पूर्व सचिव और माओवादी-समर्थक नेता ओम प्रकाश आर्यल को स्थायी रूप से गृह मंत्री बना दिया गया है लेकिन विडंबना यह है कि यही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने नेपाल की गऊ माता के अस्तित्व को मिटाने हेतु सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। यह कदम नेपाल की जनता को किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। कारण साफ है—नेपाल की 90% से अधिक आबादी हिंदू है और गाय यहाँ केवल पशु नहीं बल्कि आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।

*गऊ माता पर हमला और सुप्रीम कोर्ट की नसीहत*

ओम प्रकाश आर्यल, जो एक ब्राह्मण पंडित परिवार से आते हैं, ने जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली कि गाय को राष्ट्रीय पशु के दर्जे से हटाया जाए, तो यह नेपाल के लोगों के लिए आस्था पर सीधा प्रहार था।

*उनके तर्क थे*

• नेपाल अब धर्मनिरपेक्ष है, इसलिए गाय को राष्ट्रीय प्रतीक बनाए रखना असंवैधानिक है।

• यह हिंदू धर्म विशेष की मान्यता है।

• नेपाल को बहु सांस्कृतिक छवि देनी चाहिए।

*सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा*

• गाय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि नेपाल की संस्कृति, कृषि और लोक जीवन की धरोहर है।

• धर्मनिरपेक्षता का अर्थ परंपराओं को मिटाना नहीं है।

• गाय नेपाल की हजारों साल पुरानी सभ्यता और पहचान का प्रतीक है।

*नेपाल की अस्मिता पर चोट*

नेपाल हिमालय की देवभूमि है। यहाँ गोरखनाथ की परंपरा से लेकर गाँव-गाँव में गऊ माता की पूजा तक, हर जीवन धारा में गाय का महत्व रचा-बसा है। गाई तिहार जैसे पर्व इस सत्य के प्रमाण हैं। ऐसे में कोई भी व्यक्ति—चाहे हिंदू पंडित परिवार से क्यों न आया हो—यदि गाय को राष्ट्र प्रतीक से हटाने की सोच रखता है, तो यह केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता पर भी चोट है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर इन दिनों #RemoveAryal और #SaveCow जैसे ट्रेंड छा गए हैं। जनता गुस्से में है और गृह मंत्री के रूप में उनकी नियुक्ति को सीधा-सीधा चीन-समर्थित माओवादी विचारधारा की चाल बताया जा रहा है।

*मीडिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया*

भारत और थाईलैंड की मीडिया ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। भारत में इसे हिंदू अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं नेपाल के युवाओं और संतों ने कहा है—

*“जिस व्यक्ति ने गाय को ही खत्म करने का सपना देखा, वह जनता का विश्वास कैसे जीत सकता है ?”*

स्पष्ट है कि इस विवाद ने नेपाल के राजनीतिक समीकरण को हिला दिया है। भ्रष्टाचार और दमनकारी नीतियों से पहले ही क्षुब्ध जनता अब हिंदू अस्मिता पर हुए इस हमले को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
नेपाल की आत्मा गाय से जुड़ी है। गाय को हटाने का सपना देखने वाला व्यक्ति आज गृह मंत्रालय की कुर्सी पर बैठा है, यह केवल राजनीतिक विरोधाभास नहीं बल्कि राष्ट्रीय शर्म है।

सुप्रीम कोर्ट ने जब स्पष्ट कहा कि “सेक्युलरिज़्म की आड़ में परंपराओं और प्रतीकों को मिटाना अस्वीकार्य है” तो सवाल यह है कि क्या नेपाल की जनता ऐसे मंत्री को स्वीकार करेगी, जिसने उसकी अस्मिता को मिटाने की कोशिश की ?

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