एक वो भी समय था, जब मकान कच्चे हुआ करते थे पर रिश्ते बड़े पक्के होते थे। गोबर मिट्टी से लीपी होती थी दीवारें, लकड़ी का एक फलसा होता था, रहते थे घर में बीस-तीस लोग, हर दिन जलसा होता था।। अतिथि आने पर बांछें खिल जाती थी, कहां बिठाएं क्या खिलाएं, हृदय के भावों की बातें होती थी। वो छाछ राबड़ी, वो मोटे अनाज की रोटी, सिलबट्टे पर पिसी मिर्ची, कितनी स्वाद लगती थी। वो चटनी रोटी न जाने कहां गये वो लोग, कहां गई उनकी मीठी बातें, लगता है बदल गया अब दौर सारा। सिर्फ स्वार्थ की होती है बातें, अब कौन किसका मर्म समझता है, अब कौन मानव धर्म समझता है। अनमोल तो बस यही चाहे, वो दौर फिर से आए, मानव को मानव समझे, आओ मानवता का दीप जलाएं।
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