गोचर आन्दोलन से सरकार की छवि धूमिल

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर में कोटगेट से लेकर चौकों, चौपालों, गली-गली, मोहल्ले-मौहल्ले में गोचर आन्दोलन की अलख जगाई जा रही है। इससे सरकार, प्रशासन और नेताओं की छवि धूमिल हुई है। भाजपा जो गाय हमारी माता है नारे लगाती रही है, उसी राज में गोचर संरक्षण को लेकर न सरकार सुन रही है और न पार्टी के नेता बोल रहे हैं। प्रशासन का रवैया तो कलक्टर से मिलने गए लोगों की प्रतिक्रिया से ही साफ है। बीकानेर नगर के चहुंओर गोचर ओरण भूमि आजादी के पहले से छोड़ी हुई है। भीनासर में 5200 बीघा गोचर सेठ बंशी लाल राठी ने बीकानेर रियासत की रोजकोष में 10 हजार रुपए जमा करवाकर छुड़वाई थी। भीनासर के आम लोगों ने इसकी निगरानी रखी और यथासंभव विकास किया। स्वामी राम सुखदास जी महाराज की प्रेरणा से पूरी गोचर की तारबंदी की गई और सेवण घास लगाई गई। इसके अन्य उपयोग के प्रयास के खिलाफ लम्बा भीनासर गोचर आन्दोलन चला था, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। सुन्दर लाल बहुगुणा इस आन्दोलन के हिस्से बने थे। अभी भी गोचर संरक्षण और सुरक्षा के लिए भीनासर के आम नागरिकों की कमेटी काम कर रही है। राजस्थान सरकार या प्रशासन का इसमें तिनके जितना भी कभी सहयोग नहीं रहा। इसी तरह गंगाशहर में 6 हजार 250 बीघा गोचर में से 1943 में भैरुदान चौपड़ा परिवार ने 4 हजार 250 बीघा जमीन तथा सारड़ा परिवार ने 1949 में 2000 बीघा गोचर की जमीन राजकोष में पैसा जमा करवा छुड़वाई। अर्से तक चौपड़ा और सारड़ा परिवार गोचर संरक्षण का काम देखते रहे। अभी बंशी लाल तंवर और अन्य लोगों की देखरेख में गोचर में काम किया जा रहा है। संरक्षण के लिए आबादी क्षेत्र की तरफ बाडेबंदी करवाई गई है। सरेह नथानिया की गोचर में 40 किलोमीटर की दीवार बनाने का काम जनता के सहयोग से चल रहा है। यह गोचर नथमल नथानिया ने राज परिवार से छुड़वाई है। बीकानेर के राजा करण सिंह ने सेठ नथमल नथानिया को जनता की पेयजल के लिए कुआ खुदवाया। इसके बदले में नथमल नथानिया ने राजघराने से गोचर छोड़ने की प्रार्थना की। नथानिया को कहा गया कि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक जितनी जमीन की पैदल घूमकर नाप सकते हो, उसकी पैमाइश कर गोचर रिकार्ड में दर्ज कर दी जाएगी। नथमल नथानिया 27 हजार 205 बीघा 18 विस्वा गोचर की पैमाइस करवाई। यह जमीन आज भी इन्हीं संर्दभों के साथ गोचर रिकार्ड में कायम है। इस गोचर के लिए शर्त रखी गई कि जब तक सूरज-चांद, ग्रह-नक्षत्र रहेंगे, तब तक इस भूमि का गोचर के रूप में ही उपयोग होगा, अन्य उपयोग नहीं किया जा सकेगा। गोचर की जमीनें रिकार्ड में राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट 1951, राजस्थान टीनेन्सी एक्ट 1955, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्याय के निर्णयों के आधार पर अन्य उपयोग नहीं हो सकता। फिर बीडीए ने मास्टर प्लान 2043 में इस भूमि का अन्य उपयोग क्यो प्रस्तावित किया है ? यह सवाल नेताओं और अफसरों के समक्ष जनता उठा रही है। बीकानेर के लोग इस मुद्दे पर आन्दोलित है। सरकार में विरोध दर्ज करवाने वाले लोगों से जिला कलक्टर बात ही नहीं करती, विधायक और मंत्री चुप्पी साधे हुए हैं, जनता आन्दोलित है। वैसे देखा जाए तो गोचर ओरण का संरक्षण और विकास की सरकार की योजनाओँ में कोई खास अहमियत नहीं है। सरकार और प्रशासन का गोचर-ओरण की तरफ ध्यान भी नहीं है। राजस्थान में जहां भी गोचर-ओरण सुरक्षित है, वहां क्षेत्र की स्थानीय जनता का ही योगदान है। गोचर ओरण क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने, इलाके की वनस्पति, जीव जन्तु और पर्यावरण संरक्षण का प्राकृतिक स्थल है। नगरीय विकास में इनकी महत्ता का कोई भी योजनाकार सहज रूप से आकलन कर सकता है। फिर गोचर ओरण का अन्य उपयोग करने का प्रस्ताव मास्टर प्लान में कैसे शामिल कर लिया गया ? वैसे रिकार्ड में गोचर ओरण के रूप में दर्ज और आरक्षित है। फिर सरकार और प्रशासन की अनदेखी क्यों ? दुर्भाग्य है हमारे जनप्रतिनिधि क्यों चुप है ? जनता उध्देलित है। मास्टर प्लान में गोचर को लेकर जो प्रस्तावित योजना का जनता ने जितना विरोध किया है, इससे हमारे यहां के नेताओँ, प्रशासन और सरकार को समझ आ जानी चाहिए कि बीडीए के मास्टर प्लान में गोचर को शामिल करना स्वीकार्य नहीं है।

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