राजस्थान की सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा एक भयावह विस्फोट बन चुकी है। इसकी गूंज अब केवल अदालतों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि लाखों बेरोज़गार युवाओं के दिलों में गहरा दर्द और आशंका भर चुकी है। भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्तियों को जेल भेजना निश्चित ही न्याय की परिणति होनी चाहिए, लेकिन क्या यही न्याय होगा कि ईमानदार, मेहनती और अपने भविष्य के लिए पसीना बहाने वाले युवाओं को भी अपराधियों की तरह नौकरी से भगा दिया जाए ? ऐसे निर्दोषों को सामूहिक दंड देना न तो संविधान के तहत संभव है, न ही किसी इंसानी सहानुभूति के दायरे में आता है।
अदालत का आदेश भ्रष्ट कार्यकर्ताओं के खिलाफ तो उचित हो सकता है लेकिन उन अभ्यर्थियों के लिए जो दिन-रात मेहनत कर, अपने परिजनों के गहनों तक बेचकर परीक्षा की तैयारी में जुटे थे, उनकी मेहनत पर इस प्रकार की चोट न्याय की हत्या से कम नहीं। क्या “भर्ती निरस्त” कहकर उन परिवारों की कई वर्षों की तपस्या का मज़ाक उड़ाना नहीं हो जाता ? संविधान और कतिपय सेवा नियम चीख चीखकर कहते है कि किसी सरकारी कर्मचारी को बिना उचित सुनवाई, विभागीय जांच और वैधानिक प्रक्रिया के नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। ठीक उसी प्रकार जैसे एक विवाह सिर्फ तीन बार “तलाक” कहकर समाप्त नहीं हो जाता, वैसे ही चयनित अभ्यर्थियों को भी वैधानिक प्रक्रिया के बिना नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। सब इंस्पेक्टर नियुक्त हुए है, न कि इन्हें खैरात में नौकरी मिली है। नियुक्त हुए है तो इन्हें नौकरी से निकालने की भी एक विधिवत प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया की अनदेखी कर किसी को भी नौकरी से निकालना कानूनन अपराध है। ऐसे व्यक्ति को जो वैधानिक तरीके से नियुक्त है, को पद से हटाना इतना ही आसान होता तो बीजेपी सरकार ने अब तक आरपीएससी अध्यक्ष और सदस्य को बर्खास्त क्यो नही किया ? क्यो रोज यह रोना रोती रही कि सरकार कानूनन इन लोगो को बर्खास्त या हटा नही सकती। जब इनको हटाने का अधिकार सरकार के पास नही है तो सब इंस्पेक्टरों को विधिवत रूप से हटाने का अधिकार उसे कब हासिल हो गया ? क्या सरकार इस संबंध में कोई अध्यादेश लाई है ? पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के शासनकाल में लोक सेवा आयोग को राजनीतिक सौदों और मदद के बदले ‘रेवड़ियों’ की तरह बाटा गया, जिसके कारण आयोग इतना खोखला हो गया कि उसका वहन अब युवाओं को करना पड़ रहा है। इसका विषाक्त फल इतना तगड़ा निकला कि इसका दंश न तो बेरोज़गार सह पाएंगे और न ही वर्तमान सरकार इससे बच पाएगी। यह तो महज बानगी है। अभी तय साल तक बीजेपी सरकार को ऐसे ही जहरीले फल खाने को विवश होना पड़ेगा। यह त्रासदी कुछ राजनीतिक नेताओ के लिए बहुत ही बहुत उपजाऊ जमीन साबित हो रही है। जैसे हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा को यह अवसर "गोल्डन चांस" साबित हुआ है। दोनो ने इस मुद्दे को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का ज़रिया बनाया। दिन में सार्वजनिक रूप से विवाद, रात में गुप्त गठजोड़। मंचों पर दिखावा-नौटंकी, लेकिन युवाओं की टूटती उम्मीदों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इन पेशेवरों का असली मकसद केवल टीआरपी, पब्लिसिटी और राजनीतिक क्रेडिट जुटाना है। बेरोज़गारों का तो कोई लेना देना नहीं। दोनो यह बताने की हिम्मत नही जुटा पा रहे है कि बेईमान लोग जेल चले जाएंगे लेकिन ईमानदारी से भर्ती होने वालों को मिल रही बेवजह सजा का असल जिम्मेदार कौन है ? राजनीतिक रोटियां सेको, मगर ईमानदार लोगो की पीठ पर क्यो ? यह सवाल अब केवल एक भर्ती घोटाले का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह निवेशित विश्वास, मेहनत और सपनों के साथ हुए एक भयंकर विश्वासघात का सवाल है। क्या सच में ईमानदार युवाओं को भ्रष्टाचारियों की कीमत चुकानी पड़ेगी ? अगर ऐसा हुआ, तो यह केवल एक भर्ती मामला नहीं, बल्कि बेरोज़गारों के साथ देश का सबसे बड़ा अन्याय होगा। न्याय की सचमुच पहचान तभी होगी, जब भ्रष्ट सलाखों के पीछे जायेंगे और उसी न्यायाधीश के सामने ईमानदार युवाओं को वह सम्मान और रोजगार मिलेगा, जिसके वे हक़दार हैं अन्यथा यह फैसला इतिहास की किताबों में “न्याय के नाम पर अन्याय” के नाम पर एक काला अध्याय के तौर पर दर्ज होगा। न्यायालय ने पूरी ईमानदारी, बिना किसी पूर्वाग्रह के एक ऐतिहासिक फैसला दिया है लेकिन इसका मापदण्ड क्या है, जो जांच के दायरे से परे है, उन्हें मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंका जाए। यह जरूरी है कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक हिफाज़त के सिद्धांतों की पूरी तरह पालना हो, ताकि देश के युवा निराश न हों ताकि उनकी मेहनत व्यर्थ न जाए। कानून का तटस्थ और न्यायसंगत फैसला ही उस विश्वास की नींव रखेगा, जिसे आज सबसे अधिक जरूरत है। ऐसे लोगो के लिए यह फैसला "ऐतिहासिक" हो सकता है लेकिन उन युवाओं के लिए एक जबरदस्त प्रहार है, जिन्होंने पूरी ईमानदारी, लगन, परिश्रम, तन्मयता और समर्पण भाव से परीक्षा को अनगिनत बाधाओं को पार करते हुए उतीर्ण कर नियुक्ति पत्र हासिल किया। उनके लिए नियुक्ति पत्र फ़क़त कागज का टुकड़ा नही, भविष्य की उम्मीद, सामाजिक प्रतिष्ठा और माँ-बाप की आंखों की रोशनी में इजाफा करने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था। आज दस्तावेज भी झुलस गया और झुलस गये हजारो लोगो के सपने। हो गये सपने ध्वस्त। मिली आजीवन की निराशा, अवसाद और लोगो के ताने।