आजकल कथावाचकों की बाढ आई हुई है और आदर्श, नैतिकता व मर्यादा पर बहुत प्रवचन करते नजर आते हैं लेकिन मुझे कथावाचकों को लेकर एक वाक्या याद आता है कि एक कथावाचक सावन मास में कथावाचन कर रहे थे। सौभाग्य से एक दिन उसकी धर्मपत्नी भी कथा सुनने पहुंच गई। कथावाचक ज्ञान दे रहे थे कि सावन मास में बैंगन नहीं खाना चाहिए। कथा सुन कथावाचक की पत्नी घर आई और बैंगन की बनी सब्जी को बाहर फेक दिया। कथावाचक भी कथा समाप्ति पर घर आए और खाना खाने बैठे तो थाली में रोटी और चटनी देख क्रोधित हो गये और बोले कि सुबह ही मै ताजा बैंगन लेकर आया था, उसकी सब्जी क्यों नहीं बनाई। यह सुनकर पत्नी बोली कि आप कथा मे सावन मास में बैंगन न खाने की सलाह दे रहे थे तो मैने सब्जी तो बनाई थी लेकिन बाहर फेंक दी। यह सुन कथावाचक बोले यह उपदेश अन्य लोगो के लिए है खुद के लिए थोड़े है। इस वाक्या के उल्लेख करने का यह मायने था कि आजकल कुमार विस्वास रामकथा कर रहे है और रामकथा में राम के आदर्शों पर चलने के उपदेश देते नजर आ रहे हैं। अपने कथा वाचन में राम के चरित्र की व्याख्या करने के साथ ही नैतिकता का पाठ पढ़ाते नजर आते हैं। भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो मर्यादा का पाठ भी अपने श्रोताओं को सुनाते हैं। अभी हाल ही में एसआई भर्ती में भ्रष्टाचार को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस परीक्षा को रद्द कर दिया है। इसके रद्द होने से कांग्रेस और भाजपा दोनों का चेहरा उजागर हुआ है। गहलोत सरकार ने भाजपा की रद्द करने की मांग को दरकिनार करते हुए इस परीक्षा को रद्द नही किया। इस मुद्दे को लेकर भाजपा गहलोत पर मुखर रही कि यह सरकार युवा विरोधी सरकार है लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा ने पलटी मारी और परीक्षा रद्द न करने का निर्णय लिया। इतना ही नहीं भाजपा सरकार का अंतिम क्षणो तक यह प्रयास रहा कि 859 पदों वाली इस भर्ती को रद्द न किया जाए। जबकि भाजपा इसी मुद्दे को लेकर सत्ता में आई थी और सत्ता मिलते ही उसके मद में सुग्रीव की तरह अपने वादे को भूल गई, जो सदैव नैतिकता की बातें करती है। यह परीक्षा राजस्थान लोक सेवा आयोग ने आयोजित की थी, जिसके तत्कालीन अध्यक्ष संजय क्षोत्रिय थे। इस गड़बड़ी में उनकी भी भूमिका संदिग्ध है लेकिन उनके सेवानिवृत्त होने के नौ महीने तक भी भाजपा ने श्रोत्रिय के विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं की है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बावजूद मौजूदा सदस्य संगीता आर्य व मंजू शर्मा अपने पद पर बनी हुई है। विदित हो मंजू शर्मा कथावाचक कुमार विश्वास की पत्नी हैं और उनके मर्यादा व नैतिकता के प्रवचनों से प्रभावित होकर इस्तीफा क्यों नहीं दे रही है। इस भर्ती की गड़बड़ी में केवल छोटी मछलिया ही पकड़ी गई है, बड़े मगरमच्छ अभी भी कानून के शिकंजे से दूर है। इस आलेख का पटाक्षेप यही है कि आदर्श, नैतिकता व भ्रष्टाचार की बातें भाजपा सरकार के वादों व कुमार विश्वास के प्रवचनों की तरह अन्य लोगो पर ही लागू होते है। निश्चित रूप से यह कथनी और करनी का फर्क साफ नजर आता है ।
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