राजस्थान की भर्ती प्रणाली एक बार फिर सवालों के कठघरे में है। हाईकोर्ट ने बहुचर्चित सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इस परीक्षा के जरिए 859 पदों पर नियुक्ति होनी थी, जिनके लिए हजारों युवाओं ने महीनों तक तैयारी की लेकिन पेपर लीक और गड़बड़ियों की परतें खुलने के बाद अदालत ने साफ कह दिया कि जब किसी परीक्षा की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर धब्बा लग जाए तो उसकी पूरी प्रक्रिया का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। इस फैसले ने जहां मेहनत और सपनों में डूबे युवाओं को गहरी चोट पहुंचाई है, वहीं यह राज्य की भर्ती व्यवस्था की खोखली हो चुकी नींव को भी उजागर करता है। अदालत के सामने सरकार ने यह दलील दी थी कि गड़बड़ी केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित थी, सभी उम्मीदवारों को सज़ा देना उचित नहीं होगा लेकिन कोर्ट का कहना था कि जब पूरा सिस्टम दूषित हो चुका है तो प्रक्रिया को मान्यता देना न्याय के साथ समझौता होगा। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट्स भी यही चीख-चीखकर बता रही हैं कि पेपर पहले ही बाजार में बिक चुका था और इसमें दलालों से लेकर कुछ अधिकारियों तक की सांठगांठ शामिल थी। कहना गलत न होगा कि पेपर माफिया के सामने पूरा तंत्र घुटनों पर झुक गया। इस फैसले ने राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने तुरंत कांग्रेस सरकार को घेर लिया और उसे “पेपर लीक सरकार” की संज्ञा दी। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस युवाओं को रोजगार देने के नाम पर छल रही है और बार-बार उनकी मेहनत को माफियाओं के हाथों तिलांजलि दे रही है। उनके अनुसार यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सत्ता की नीयत पर भी गहरा सवाल है। दूसरी ओर सरकार ने सफाई दी है कि दोषियों पर कार्रवाई होगी और ईमानदार अभ्यर्थियों को न्याय मिलेगा, लेकिन अदालत का फैसला इन आश्वासनों पर भारी पड़ गया। कांग्रेस के भीतर भी बेचैनी है क्योंकि युवाओं का भरोसा अब लगातार दरकता जा रहा है और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह झटका पार्टी को चुनावों में भारी पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने बेरोजगार युवाओं में गुस्से की लहर पैदा कर दी है। सोशल मीडिया पर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं, जिले-जिले में प्रदर्शन की तैयारी हो रही है और बेरोजगार संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा। कई अभ्यर्थियों ने यह भी संकेत दिए हैं कि वे सामूहिक रूप से सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का आदेश भले ही कठोर है, लेकिन शीर्ष अदालत में प्रभावित उम्मीदवारों की अपील पर सीमित राहत मिलने की संभावना हो सकती है। असल सवाल यही है कि आखिर राज्य में हर दूसरी बड़ी परीक्षा क्यों लीक हो जाती है ? क्यों मेहनती और ईमानदार अभ्यर्थियों को बार-बार धोखा सहना पड़ता है जबकि असली दोषी बच निकलते हैं ? यह केवल एक परीक्षा रद्द होने की कहानी नहीं बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा है, जिसकी सड़ांध में युवाओं के सपने बार-बार कुचले जाते हैं और जिम्मेदारों की जवाबदेही कभी तय नहीं होती।
अब सबकी नज़र सरकार पर है कि वह नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया शुरू करेगी या सुप्रीम कोर्ट की राह लेगी, लेकिन इतना तय है कि हाईकोर्ट के इस फैसले ने राजस्थान की भर्ती प्रणाली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में न सिर्फ अदालत और सड़क पर उफान मचाएगा बल्कि राजनीतिक संग्राम का केंद्र भी बनेगा। इस फैसले के बाद आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल के कद में जबरदस्त इजाफा हुआ है।