राजस्थान में राज्य निर्वाचन आयुक्त मधुकर गुप्ता की विदाई 17 सितंबर को तय है। सामान्य हालात में यह महज़ एक संवैधानिक नियुक्ति होती, लेकिन इस बार मामला संवैधानिक कम और राजनीतिक ज्यादा है। वजह किसी से छिपी नहीं। दिसंबर 2025 के पंचायत और नगर पालिका चुनाव होने जा रहे है, जो भाजपा सरकार की पहली बड़ी परीक्षा होंगे। निर्वाचन आयुक्त का पद चुनावी मौसम में साधारण कुर्सी नहीं, बल्कि सत्ता की रिमोट कंट्रोल बन जाता है। कलेक्टर से लेकर पटवारी और बूथ स्तर तक पूरा तंत्र उसी के आदेश पर चलता है। ऐसे में भाजपा के लिए यह नियुक्ति महज़ “काबिल अफसर की खोज” नहीं, बल्कि चुनावी जीत का पहला दांव है। अब बात करें दावेदारों की। राजेश्वर सिंह राजपूत समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रशासनिक कामकाज में दक्ष माने जाते हैं। परंतु, उनकी “पायलट कनेक्शन” भाजपा के लिए उलझन है। पीके गोयल सबसे “सेफ़ बेट” माने जा रहे हैं। वैश्य समाज का प्रतिनिधित्व, निष्कलंक छवि और हर सरकार में सहज काम करने का रिकॉर्ड, उनके लिए कुर्सी पर बैठने का रास्ता आसान बना सकता है। शुभ्रा सिंह महिला नेतृत्व का खालीपन भर सकती हैं, साथ ही भाजपा को महिला मतदाताओं को लुभाने का बहाना भी देंगी। वहीं आनंद कुमार, दलित पृष्ठभूमि और मुख्यमंत्री की नज़दीकी के चलते सबसे “राजनीतिक विकल्प” बन जाते हैं। उनकी छवि काबिल और दक्ष अफसरों में शुमार है। शिखर अग्रवाल से उनकी नजदीकियां भी लाभकारी सिद्ध हो सकती है। इसके अलावा वे पहले भी वे निर्वाचन विभाग का कामकाज देख चुके है। एक अन्य सेवानिवृत आईएएस का नाम भी सुर्खियों में सीएम से लेकर पीएम तक इनके कार्य से काफी प्रभावित है। यानी सवाल यह नहीं है कि सबसे योग्य कौन है; असली सवाल यह है कि भाजपा किस कार्ड को टेबल पर रखेगी। राजपूत, वैश्य, महिला या दलित। पांच पत्ते हैं, पर दांव एक ही चलेगा। फैसला जो भी हो, साफ है कि यह नियुक्ति केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होगी। यह भाजपा की रणनीति का पहला सार्वजनिक ऐलान होगी। इसके अतिरिक्त शायद आने वाले चुनावों की दिशा भी यही तय करेगी।
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