केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारे हो, आखिर न्याय पालिका के कहने पर ही उनकी आंखें क्यों खुलती है। कार्य पालिका जब पंगु बन जाए तो न्याय पालिका को आगे आना होता है। राजस्थान में भजन लाल शर्मा सरकार को हाईकोर्ट की फटकार के बाद खलबली मची हुई है। विदित हो भजन लाल शर्मा सरकार के आते ही वन स्टेट वन इलेक्शन का झांसा देकर स्थानीय शहर निकायों व पंचायतों पर अपने चहेते अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया। हाईकोर्ट के आदेश के आने के बाद निर्वाचन आयोग के पास अब 11 हजार ग्राम पंचायत व 150 शहरी निकायों के चुनाव करवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुसार ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों के चुनाव छह महीने के बाद करवाना अनिवार्य है। इन चुनावों को अनिश्चितकालीन समय के लिए स्थगित नहीं रखा जा सकता है। राजस्थान के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया कि ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों के चुनावों को लेकर प्रकिया शुरू कर दी गई है। राजस्थान में भजन लाल शर्मा की सरकार बनते ही दावा किया गया था कि अब वन स्टेट वन इलेक्शन के तहत ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों के चुनाव एक साथ करवाए जायेंगे। यह सुझाव व प्रयास निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम था क्योंकि इसमें खर्चा भी कम होता। इसके लिए सरकार ने एक मंत्रिमंडल उपसमिति का भी गठन किया था। ये उपसमिति भी केवल परिसीमन को लेकर राजनीति करती रही। राज्य के हर जगह से परिसीमन को लेकर हो रही राजनीति के विरोध में प्रदर्शन भी हुए लेकिन सरकार आंखों पर पट्टी बांधे रही और स्थानीय नेताओं की मनमर्जी के मुताबिक परिसीमन के कागज बनते रहे। हाईकोर्ट के इस फैसले से सरकार बैकफुट पर आ गई और निर्वाचन अधिकारी ने जल्द ही चुनावों के घोषणा की बात कही। यदि भजन लाल शर्मा सरकार को यही करना था तो एक साल तक वन स्टेट वन इलेक्शन का राग क्यों अलापते रही। इस फैसले से सरकार की किरकिरी तो हुई ही है बल्कि सरकार की कार्यशैली में शिथिलता को लेकर भी प्रश्न चिन्ह खड़े होते हैं। भाजपा ने बैठे बिठाए विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया लेकिन अफ़सरशाही व सरकार में अभी भी विरोधाभासी स्वर सुनाई दे रहे हैं। निर्वाचन अधिकारी के उलट सरकार के मंत्री मदन दिलावर व झाबर सिंह खर्रा ने ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों के चुनाव एक साथ करवाने के संकेत दे दिए हैं। यदि ऐसा होता है तो चुनाव अगले साल जनवरी फरवरी में हो सकते हैं। मौजूदा समय में अधिकांश ग्राम पंचायतों व शहरी निकायों का कार्यकाल पूरा हो चुका है या फिर बाकी अगले साल जनवरी फरवरी में पूरा हो जाएगा। निर्वाचन अधिकारी की तत्परता को देखकर सरकार भी खुश नहीं हैं। यदि चुनाव दिसम्बर तक होते हैं तो उसी पुराने ढर्रे पर होंगे कोई वार्ड में बढ़ोतरी या परिसीमन जैसी बात नहीं दिखाई देगी ।
कार्य पालिका की नींद आखिर न्याय पालिका की फटकार के बाद ही क्यों खुलती हैं
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August 21, 2025
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