वाह रे इंसान, किया तूने कर्म बहुत महान। कहर कुदरत का उत्तराखंड में ले आया फिर प्रलय एक बार, जो बना गया तपोवन को श्मशान।। क्या सोचा था तुमने इन्सां नहीं लेगी प्रकृति तुमसे बदला। जाने कितने उजड़ गए घर बार, मेहनती मजदूर गरीब बेचारे, बन गए काल के ग्रास ये सारे। मत छेड़ो तुम प्रकृति को इतना, कब तक पर्वत सहता रहेगा, कभी तो सब्र का टूटेगा बांध।। कितना तुमको चेताया था, फिर भी जिद पर अड़े रहे तुम हो गए ध्वस्त प्रोजेक्ट और डैम। क्यों करते हो इतना लोभ, मत बनो तुम पागल इतना प्रगति की इस दौड़ में।।
बार-बार संकेत है देती प्रकृति
क्यों नहीं डरते, उसके प्रहार से
बदला लेने पर जब आती
विनाशकारी तब बन जाती वो
फिर भी समझ नहीं पाते तुम
कब तक स्वार्थी बने रहोगे।।
छेड़ोगे गर कुदरत को तुम
बच ना पाओगे प्रहार से उसके
गिन-गिन बदला लेगी वो फिर
बिगड़ी तो होगा भयानक उसका मंजर। भूल गए क्या इतनी जल्दी
केदारनाथ मंदिर का वो मंजर,
वाह रे इंसान।