संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज सत्संग में: हे सन्तो ! आप ही कहो कि मैं आपको क्या उपदेश करूँ ? सब मिलकर भगवान का भजन करे वहीं सत्य है। सन्तो और कहौ क्या कहिये, हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये॥ हम तुम्ह मांहिं बसै सो स्वामी, साचे सौं सचु लहिये।
दरसन परसन जुग जुग कीजै, काहे कौं दुख सहिये॥ हम तुम संगि निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये। चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे कौं बहिये।
दादू देखु और दुख सबहीं, तामैं तन क्यौं दहिये। अर्थात हे सन्तो! आप लोग ही कहो कि मैं आपको क्या उपदेश करूं ? मैं तो यही अच्छा मानता हूँ कि आप लोग और मै सब मिलकर भगवान् का भजन करते हुए उसी के पास निवास करें। यह ही मेरे सतगुरु ने उपदेश दिया था। वह राम सबके हृदय में ही बसता है। उसी को भजकर ब्रह्मानन्द रस का पान करो। मायिक विषयों में मन को लगाकर व्यर्थ में ही कष्टन क्यों सह रहे हो ? क्योंकि यह सर्वविदित है कि विषय भोग तो महारोग रूप है तथा कष्ट देनेनवाले हैं। हम सब प्रभु के चरणों की शरण ग्रहण करके वहाँ पर ही अपनी बुद्धि मन को लगाकरननिवास करें, क्योंकि अन्यत्र जाना तो निष्फल है। संसार से पार करने वाले चैतन्य-स्वरूप अति सुन्दर शरणागति को प्राप्त करके भजन द्वारा अपने जीवन का निर्वाह करें। अन्य सब तो दुःखनरूप प्रलयानल की तरह जलाने वाले हैं। अत: प्रभु के शरण में जाना ही अच्छा है। विष्णु भगवान् का नाम, चिन्तन करने वाले भक्तों के पापों को नष्ट करता है, पुण्य को पैदा करता है, ब्रह्म आदि लोकों के भोगो से वैराग्य पैदा करके गुरु के चरण-कमलों में भक्ति पैदा करता है, तत्वज्ञान को पैदा करके जन्म-मरण आदि के बीज रूप अविद्या को नष्ट करके ब्रह्मानन्द के समुद्र में डुबोकर निवृत्त हो जाता है। श्रीमद्भागवत में-जिन्होंने पुण्य-कीर्ति मुकुन्द भगवान् के पद-पल्लव की नौका का आश्रय लिया है, जो सत्पुरुषों का सर्वस्व है, उनके लिये भवसागर बछड़े के खुर से बने गड्ढे के समान है। उन्हें परम पद की प्राप्ति हो जाती है और उनके लिये विपत्तियों का निवास स्थान यह संसार नहीं रहता।