धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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मोहन माधव कब मिलै, सकल शिरोमणि राइ। तन मन व्याकुल होत है, दरस दिखाओ आइ॥ नैन रहे पथ जोवताँ, रोवत रैनि बिहाइ। बाल सनेही कब मिलै, मोपै रह्या न जाइ॥ छिन-छिन अंग अनल दहै, हरिजी कब मिलि हैं आइ। अंतरजामी जान कर, मेरे तन की तप्त बुझाइ॥ तुम दाता सुख देत हो, हाँ हो सुन दीनदयाल। चाहैं नैन उतावले, हाँ हो कब देखूं लाल॥ चरन कमल कब देख हौं, हाँ हो सन्मुख सिरजनहार। सांई संग सदा रहौं, हाँ हो तब भाग हमार॥ जीवनि मेरी जब मिलै, हाँ हो तब ही सुख होइ। तन मन में तूँ ही बसै, हाँ हो कब देखूं सोइ॥ तन मन की तूँ ही लखै, हाँ हो सुन चतुर सुजान। तुम देखे बिन क्यों रहौं, हाँ हो मोहि लागे बान॥ बिन देखे दुख पाइये, हाँ हो इब विलम्ब न लाइ। दादू दरशन कारणैं, हाँ हो सुख दीजे आइ॥ हे सर्वशिरोमणि विश्व सम्राट् मनोमोहन माधव ! आप मुझे कब मिलेंगे क्योंकि आपके बिना मेरा मन और शरीर व्याकुल हो रहा हैं, सो आप यहाँ पधारकर दर्शन दीजिये। आपके आने का रास्ता देखते-देखते मेरे नेत्र भी थक गये हैं। नेत्रों में अश्रुधारा बहाते-बहाते रात पूरी होती हैं। हे राम ! आप बालकपन से ही मेरे साथी हैं। अतः कहिये कि कब दर्शन दे रहे हैं। आपके बिना मेरा जीवन सुखी नहीं है। साथ में यह विरहाग्नि तो मेरे हरेक अंग को प्रतिक्षण जला रही हैं। आपका मेरे हृदय में मिलन कब होगा। आप अन्तर्यामी हैं अतः मेरी सारी स्थिति को जानकर शरीर में उत्पन्न विरहाग्नि को दर्शन देकर शान्त करें। आप तो भक्तों को सुख देने वाले हैं अतः मेरी भी विनय सुनें मेरे नेत्र तो आपके दर्शनों के लिये जल्दी कर रहे हैं। हे प्यारे प्रभो ! आप ही कहिये कि मैं कब आपके दर्शन पाऊंगा। हे सृष्टि की रचना करने वाले प्रभो ! मैं आपने सन्मुख आपके दर्शन कब पाऊंगा। आपके चरणकमलों का दर्शन कब होगा। मैं तो अपने भाग्य को तब ही सफल मानूंगा कि जब मैं सर्वदा आपके साथ निवास करूंगा। मेरे जीवन के आधार प्राणनाथ ! जब भगवान् मुझे प्राप्त होंगे तब ही मैं सुखी होऊंगा। शास्त्रों में तो सुनते हैं कि – वह परमात्मा सर्वशरीरों में व्यापकरूप से रहता हैं लेकिन उस सर्वव्यापक का मुझे दर्शन कब होगा यह मैं नहीं जानता। आप मेरे मन और शरीर की सारी स्थिति जान रहे हैं। तो मैं इस स्थिति मैं सदा कैसे जीवित रहूंगा। विरहवाणों से मैं पीड़ित हूँ, आपको देखे बिना बड़ा दुःखी हूँ । अब दर्शन देने में विलम्ब न करें किन्तु दर्शन देकर मुझे सुखी बनावे। भक्तिरसायन में कहा है कि आपका प्रादुर्भाव सब प्राणियों को सुख देने के लिये हुआ। अतः आप ब्रज से मत जाइये। यदि आप कहें कि तुम्हारे में मान आ गया तो मा (लक्ष्मी) तो हमारे साथ सदा ही रहती हैं और इस लोक में यह भी प्रसिद्ध हैं कि हम आपकी हैं और आप हमारे प्राणप्रिय हैं, तो फिर दर्शन न देने में कोई सद्हेतु नहीं दीखता तो फिर दर्शन देने में विलम्ब क्यों कर रहे हैं। हमारे मानरुपी अपराध को देखकर यदि आपका मन हमारे को त्यागने का कर रहा है तो भी ठीक नहीं हैं क्योंकि अपराध तो थोड़ा और दण्ड बहुत ज्यादा है। फिर हम नेत्रों ने तो आपका कोई अपराध किया ही नहीं तो फिर अन्य के अपराध का दण्ड इन निर्दोष नेत्रों को देकर अधर्म क्यों कर रहे हैं, अतः दर्शन देवो। इस निर्जन वन में हम कामदेव से पीड़ित हैं और आपके चरण कमलों से अन्य हमारी कोई गति नहीं है। अतः हे दयालो ! दर्शन न देकर यह नया अपराध क्यों कर रहे हैं। अतः करुणा करके थोड़ा सा दर्शन दे दीजिये।

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