राजस्थान की राजनीति में अगर कोई नाम है जो वर्षों से सत्ता के शिखर पर रहा है, तो वह है—वसुंधरा राजे। दो बार की मुख्यमंत्री, अपार जनाधार और एक खास राजपूताना आभा। राजे का नाम आज भी राजनीति में सिहरन पैदा करता है लेकिन सवाल यह है कि जब उनकी अनदेखी हो चुकी है, मुख्यमंत्री की कुर्सी भजन लाल शर्मा को सौंप दी गई है, तो क्या वसुंधरा राजे चुप बैठेंगी या वे कोई बड़ा धमाका करेंगी, महत्वपूर्ण सवाल यही है। दरअसल, 2023 विधानसभा चुनाव के बाद वसुंधरा खेमा उम्मीद में था कि पार्टी आलाकमान उन्हें तीसरी बार मुख्यमंत्री पद सौंपेगा। उनकी संगठन में ताकत, जमीनी पकड़ और महिला वोट बैंक पर प्रभाव किसी से छिपा नहीं लेकिन हाईकमान ने उन्हें एक किनारे कर भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बना दिया। इस फैसले ने न केवल राजे समर्थकों को ठगा महसूस कराया, बल्कि खुद वसुंधरा के आत्मसम्मान को भी चुनौती दी। तब से अब तक राजे खामोश नहीं रहीं। कभी अचानक बीजेपी मुख्यालय पहुंच जाना, कभी मंदिरों में दिखना, कभी सोशल मीडिया पर भावुक संदेश देना। ये सब इशारे साफ हैं कि वसुंधरा कोई 'राजनीतिक संन्यास' लेने नहीं जा रहीं है बल्कि माहौल को बारीकी से तौल रही हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या वसुंधरा राजे सरकार गिरा सकती हैं ? इसका जवाब होगा नही क्योकि वे बखूबी जानती है कि पार्टी में अनुशासन तोड़ना आत्मघाती कदम साबित होगा। एक बार उन्होंने आलाकमान को आंख दिखाई थी। नतीजा सामने है। वे हाशिये पर चली गई और एक नए विधायक की पर्ची उनसे खुलवाकर भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। जहां तक राजे समर्थकों का आंकड़ा विधानसभा में 25–30 विधायकों तक बताया जाता है। ये वे विधायक हैं, जो उन्हीं के दम पर चुनाव जीते और खुले मंचों से यह कहते भी रहे कि “हमारी नेता वसुंधरा राजे हैं।” यदि राजे चाहें तो ये विधायक भजन लाल सरकार को मुश्किल में डाल सकते हैं। मगर क्या सिर्फ असंतोष से सरकार गिराई जा सकती है ? भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है—अनुशासन। हाईकमान ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि किसी भी प्रकार की 'फूट' या 'गुटबाजी' को सख्ती से निपटाया जाएगा। वसुंधरा भी यह बात समझती हैं। वे कोई भी कदम सोच-समझकर उठाती हैं। उनके लिए सरकार गिराना उतना आसान नहीं, क्योंकि इससे वे खुद पार्टी नेतृत्व के कोपभाजन में आ सकती हैं और वे इतनी परिपक्व नेता हैं कि पार्टी के बाहर जाकर कोई विद्रोह नहीं करेंगी। हालांकि, यह भी सच है कि अगर बीजेपी नेतृत्व उन्हें बार-बार हाशिए पर रखता रहा, उन्हें सम्मानजनक भूमिका नहीं दी गई—तो वे परोक्ष रूप से सरकार के खिलाफ वातावरण बनवा सकती हैं। कुछ विधायकों के नाराज़गी के सुर, अफसरशाही के अति सक्रिय हस्तक्षेप और सरकार की धीमी गति, ये सब मिलकर भीतर ही भीतर अस्थिरता का बीज बो सकते हैं। एक ओर है पार्टी नेतृत्व की अवहेलना, दूसरी ओर है जनाधार और उनकी आत्मछवि। वे न तो आसानी से झुकेंगी, न ही खुलकर टकराव मोल लेंगी। यही राजनीतिक चतुराई उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है। सरकार गिराने की बात वे सोच तो सकती है लेकिन अमल में नही ला सकती है। हालांकि गहलोत से उनके सम्बन्ध बहुत ही मधुर है। जब गहलोत सरकार संकट में थी, तब राजे ने पर्दे के पीछे ऐसा खेल खेला, जिससे सब अचंभित रह गए। प्रत्यक्ष रूप से वे सरकार गिराने की हिम्मत तो नही जुटा सकती है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वे सरकार की नींव में दरार जरूर ला सकती है। यदि उन्हें सम्मानजनक भूमिका नहीं दी गई। वे चाहें तो दिल्ली तक संदेश भेज सकती हैं कि “या तो मुझे केंद्र में यथोचित जिम्मेदारी दी जाए या मैं चुप नहीं बैठूंगी।” यदि उन्हें अपनी छवि बचाए रखनी है, तो उन्हें अब खुलकर अपनी भावनाएं सामने लानी होंगी। या तो केंद्र में उपराष्ट्रपति जैसे पदों की ओर बढ़ें, या फिर राजस्थान में जनसंपर्क तेज कर संगठन को अपनी ताकत का एहसास कराएं। राज्यपाल का पद वे पहले ही अस्वीकार कर चुकी है और उपराष्ट्रपति उन्हें बनाया जाएगा, संशय है। वे सत्ता के लिए लालायित नहीं, पर अपनी अनदेखी को पचा भी नहीं पा रहीं। यही द्वंद ही उन्हें आने वाले समय में राजनीति की नई धुरी बना सकता है। राजे की चुप्पी शांति नहीं है। वह तूफान से पहले की तैयारी है। सरकार गिराना उनके लिए अंतिम विकल्प हो सकता है लेकिन यह तय है कि अगर पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज किया तो वे “राजनीतिक विद्रोह” का एक चौंकाने वाला चेहरा बन सकती हैं। राजस्थान की सियासत में अभी भी “राजे युग” समाप्त नहीं हुआ—वह अगली करवट की प्रतीक्षा कर रहा है।
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