बीजेपी अध्यक्ष पद को लेकर जबरदस्त घमासान: आरएसएस के वीटो से नही हो रहा है चयन

AYUSH ANTIMA
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दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा मुख्यालय में इन दिनों जितनी खामोशी है, उतनी ही बेचैनी पार्टी के अंदर और बाहर है। सवाल सबके जेहन में है कि आखिर देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी अब तक अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा क्यों नहीं कर पा रही ? क्या यह महज़ संगठनात्मक प्रक्रिया की देरी है या फिर कुछ और गहरी सियासत चल रही है ? सबसे पहले बात करें बीजेपी संविधान की। पार्टी का नियम साफ है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तभी संभव है, जब कम से कम 50 फीसदी राज्य इकाइयों में प्रदेश अध्यक्षों का चयन हो चुका हो। कुल 37 राज्य इकाइयों में से अभी तक लगभग 14 से 16 राज्यों में ही प्रक्रिया पूरी हो पाई है। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, तेलंगाना और मणिपुर जैसे बड़े राज्यों में संगठन चुनाव लंबित हैं। इसके बिना राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चुनाव अधूरा ही माना जाएगा। कहानी सिर्फ प्रक्रिया की नहीं है। अंदरूनी जानकारियों के अनुसार पार्टी और संघ के बीच इस बार नेतृत्व को लेकर एक मौन संघर्ष भी चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह एक ऐसे अध्यक्ष की तलाश में हैं, जो चुनावी मशीनरी में कुशल हो, मीडिया फ्रेंडली हो और आगे चलकर 2029 की सत्ता की रणनीति को मजबूत करे। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्राथमिकता एक अनुशासित, संगठन-निष्ठ, वैचारिक रूप से स्पष्ट और जमीन से जुड़ा चेहरा है। सूत्रों की मानें तो संघ “रबर स्टैंप” अध्यक्ष नहीं चाहता । इसी बात को लेकर आम सहमति नहीं बन पा रही है। बीजेपी के अंदर चल रहे समीकरण भी इस गतिरोध में योगदान दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में संगठन और सरकार के बीच सामंजस्य की कमी रही है। कई जगहों पर स्थानीय नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर खुलेआम विरोध तक कर डाला है। जब राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पा रही तो राष्ट्रीय नेतृत्व तय करना भी एक सियासी कसरत बन गया है। नामों की चर्चा खूब है। शिवराज सिंह चौहान, भूपेंद्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, मनोहर लाल खट्टर और यहां तक कि सुनील बंसल जैसे नाम उछाले जा चुके हैं। इनमें शिवराज सिंह को सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है। वे संघ की पसंद भी हैं और मोदी‑शाह की टीम से भी उनका तालमेल बेहतर है लेकिन अभी तक आधिकारिक घोषणा नहीं होना यह संकेत देता है कि अंतिम मंजूरी कहीं न कहीं अटकी हुई है। अंदरखाने ये भी खबरें हैं कि पार्टी बिहार और पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति के तहत अध्यक्ष की घोषणा को टाल रही है। माना जा रहा है कि नया अध्यक्ष तभी सामने लाया जाएगा, जब वह अगले दो साल की चुनावी चुनौतियों को साधने में निर्णायक भूमिका निभा सके। दिलचस्प यह है कि बीजेपी जैसे हाई-कैडर पार्टी में शीर्ष नेतृत्व को लेकर ऐसी खींचतान सार्वजनिक रूप से कभी सामने नहीं आती लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस है। एक सीनियर नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर हमारी पार्टी वक्त पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं चुन पा रही, तो यह नीचे तक गलत संकेत देता है। हमें फैसला लेना होगा, और जल्दी लेना होगा।” इस बीच, संघ ने भी स्पष्ट संकेत दे दिए हैं—अब की बार अध्यक्ष ऐसा नहीं चलेगा जो सिर्फ 'हाईकमान' के इशारे पर चले। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व अब हर चाल फूंक-फूंक कर चल रहा है। एक चूक 2026 के विधानसभा चुनावों और 2029 की तैयारियों पर भारी पड़ सकती है। अब सबकी निगाहें अगले कुछ हफ्तों पर टिकी हैं। क्या संघ और सरकार के बीच सहमति बनेगी ? क्या शिवराज सिंह चौहान वाकई निर्विरोध अध्यक्ष बनेंगे या फिर एक चौंकाने वाला नाम सामने आएगा ? इस असमंजस और ऊहापोह के बीच एक बात तो तय है कि भाजपा का अध्यक्ष पद केवल एक कुर्सी नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की सियासी दिशा तय करने वाला निर्णय बनने जा रहा है।

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