समाज की युवा पीढ़ी मे सनातनी संस्कारों के बीजारोपण की जरूरत

AYUSH ANTIMA
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गाय सनातन धर्म में पूज्या जिसका बखान ऋषि मुनियों ने भी किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि समुद्र मंथन के समय कामधेनु का भी आगमन हुआ था।‌ महान साहित्यकार प्रेमचंद ने भी अपने उपन्यास गौदान में होरी की गाय का बहुत ही सटीक व सुंदर चित्रण किया। ज्योंहि होरी गाय लेकर घर आया तो पूरा परिवार खुशी के मारे फूला नहीं समा रहा था। गौमूत्र, गोबर व गाय का घृत मांगलिक कार्यों में काम में लिया जाता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की गाय एक सच्चे सनातनी के लिए पशु न होकर पूजने वाली कामधेनु है। आज वही भगवान कृष्ण की प्रिय गाय अपने जीवन के संकट काल से गुजर रही है।  जो राजनीतिक दल गाय की पूंछ पकड़कर सता की दहलीज तक पहुंच गया, वह सनातन धर्म को बचाने की बात कर रहा है  क्योंकि सनातन धर्म अब खतरे में है। यदि गौवंश नहीं बचा तो सनातन धर्म को बचाने की बात करना केवल नाटक होगा। हमारी युवा पीढ़ी सनातनी संस्कारों से विमुख होकर पश्चिमी सभ्यता की तरफ बढ़ रही है।‌ समाज में इतना खुलापन आ गया है कि इसको लेकर "आज काल या ही हो रही है भाया" कहकर हम पिंड छुड़वा लेते है। हमारे संस्कारों में पतन का ही कारण है कि आज लव जिहाद के मामले देखने को मिल रहे हैं। मंदिरों की तरफ युवा पीढ़ी का रूझान इस बात का प्रतीक है कि हमारे समाज से सनातनी मूल्यों का पलायन हो रहा है। बड़े बडे धार्मिक स्थलों पर आस्था कम बल्कि पिकनिक स्थल बनकर रह गये है। संयुक्त परिवारों का विखंडन व एकाकी जीवन ने हमारे समाज को उस मुहाने पर खड़ा कर दिया, जहां हमारे के स्थान पर मेरा आ गया है। क्या हमारे सनातन धर्म को संत महात्मा ही बचायेंगे ? जब तक समाज में संस्कारों का पोषण नहीं होगा, युवा पीढ़ी का गौवंश के प्रति सम्मान व आदर नहीं होगा, सनातन धर्म की बात करना बेमानी होगा। हमें समझना होगा कि राजनीतिक दल केवल धर्म के नाम पर हमारे संस्कारों व विचारो का दोहन कर रहे है, जातियों के नाम पर वोटों की राजनीति कर सनातन को कमजोर करने का काम कर रहे हैं। आज भी सत्ता को लेकर अंग्रेजों वाली निती का अनुसरण हो रहा है कि फूट डालो राज करो। सनातन धर्म के संकट की दुहाई देकर राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। आज जरूरत है युवा पीढ़ी में संस्कारों के बीजारोपण की, जिनकी वजह से हमारा सनातन धर्म विश्व में श्रेष्ठ स्थान रखता है।

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