भाजपा विधायक ने अपनी ही सरकार को घेरा

AYUSH ANTIMA
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भाजपा शुचिता, सिध्दांतों व अपने छोटे से छोटे कार्यकर्ता को तवज्जो देने का दंभ भरती रहती है। एक चाय वाला भाजपा जैसे राजनीतिक दल में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है, यह सुन सुनकर लोगों के कान पक गये। राजस्थान की बात करें तो इसको लेकर भी बहुत प्रचार किया गया कि यह भाजपा ही है, जो भजन लाल शर्मा जैसे साधारण कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप सकती है लेकिन इसके विपरीत खींवसर के उपचुनाव में हनुमान बेनीवाल की विरासत को ध्वस्त करने वाले विधायक रेवतराम डागा ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर विपक्ष को एक नया मुद्दा दे दिया है। विधानसभा में विपक्ष वैसे ही पर्ची की सरकार कहकर हमलावर रहता है, अब रेवतराम डागा के आरोप ने भाजपा में खलबली मचा दी है। सूत्रों की मानें तो उन्होंने भजन लाल शर्मा को अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा है कि उनकी कुछ भी नहीं चलती। अधिकारी उनकी कोई सुनवाई नहीं करते जबकि बेनीवाल के समर्थकों के काम धड़ल्ले से हो रहे हैं।
डागा ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में लिखा है कि उनकी अनुशंसा के खिलाफ अधिकारियों की नियुक्तियां हो रही है। खींवसर में तहसीलदार, नायब तहसीलदार, सीडीपीओ, उप रजिस्ट्रार, बीडीओ आदि अधिकारियों को लेकर स्थानांतरण व पदस्थापन की अनुशंसा की थी लेकिन एक भी नियुक्ति नहीं दी गई। सांसद हनुमान बेनीवाल जो चाहते हैं, वहीं हो रहा है। अब सवाल यह उठता है कि अधिकारियों के तबादलों को लेकर विधायक इतने चिंतित क्यों नजर आते हैं। क्या कोई अनैतिक कार्यों को लेकर अपने चहेते अधिकारियों की नियुक्ति चाहते हैं, जिससे उनके निजी स्वार्थों की पूर्ति हो सके। जो भी अधिकारी नियुक्त हैं, वह सरकारी मुलाजिम है, इसमें विधायकों को दिक्कत क्यों होती है। शायद कोई छुपे हुए एजेंडे के तहत अपने अधिकारियों की नियुक्तियां चाहते हैं, उनको आमजन से कोई लेना-देना नहीं। इसके साथ ही जब सरकार भाजपा की है और उसी के विधायक यह आरोप लगा रहे हैं कि उनकी नहीं हनुमान बेनीवाल की चलती है तो आम कार्यकर्ता की सुनवाई वाली बात बेमानी ही होगी। संवैधानिक पद पर विराजमान एक विधायक अपनी पीड़ा को व्यक्त कर रहा है, इसके विपरीत विधायक प्रत्याशी कोई संवैधानिक पद नहीं होता लेकिन इस शासन में विधायक प्रत्याशी अधिकारियों की बैठक ही नहीं ले रहे बल्कि सरकारी कार्यों का लोकार्पण भी कर रहे है। यह केवल भाजपा सरकार में ही संभव है कि एक जन प्रतिनिधि, जिसको जनता ने चुना है, वह लाचार है व एक उम्मीदवार, जिसको जनता ने नकार दिया, वह जन प्रतिनिधि का रोल अदा कर रहा है ।

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