गली गली में फर्जी पत्रकारों का बोलबाला

AYUSH ANTIMA
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जयपुर: सूचना क्रांति के इस दौर में डिजिटल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पोर्टलों के अभूतपूर्व विस्तार ने जहां एक ओर आम नागरिक की आवाज को मंच दिया है, वहीं दूसरी ओर इसके समानांतर ‘फर्जी पत्रकारों’ की एक ऐसी अनियंत्रित खेप तैयार कर दी है, जो समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। आज देश के ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरीय सीमाओं तक, गले में फर्जी प्रेस आईडी कार्ड लटकाए और वाहनों पर ‘PRESS’ लिखवाए घूम रहे इन तत्वों का मुख्य उद्देश्य पत्रकारिता नहीं, बल्कि भय का माहौल पैदा कर उगाही करना बन गया है। छोटे व्यापारियों, सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों और निर्माण कार्यों से जुड़े ठेकेदारों को डरा-धमकाकर जबरन वसूली करना इन स्वयंघोषित मीडियाकर्मियों का रोजमर्रा का पेशा हो चुका है।
चूंकि इनके पास न तो पत्रकारिता की कोई बुनियादी समझ होती है और न ही नैतिक मूल्यों का कोई बोध, इसलिए ये सनसनीखेज और भ्रामक खबरों (फेक न्यूज) को हवा देकर किसी भी संभ्रांत व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को पल भर में धूमिल कर देते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ रही है, बल्कि उन वास्तविक और निष्ठावान पत्रकारों की साख पर भी गहरा आघात कर रही है, जो जोखिम उठाकर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा को बचाए हुए हैं। यदि सरकार ने समय रहते इस अनियंत्रित बाढ़ पर अंकुश नहीं लगाया, तो यह प्रवृत्ति भारतीय समाज के लोकतांत्रिक और प्रशासनिक ढांचे के लिए एक ऐसा नासूर बन जाएगी, जिसका उपचार भविष्य में अत्यंत दुष्कर होगा। इस विकट समस्या से निपटने में हमारा वर्तमान कानूनी ढांचा पूरी तरह अपर्याप्त और लाचार नजर आता है। भारतीय प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 की शक्तियां केवल प्रिंट मीडिया यानी समाचार पत्रों तक ही सीमित हैं। यानी इसके पास भी कोई ठोस दंडात्मक अधिकार नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर, आईटी नियम 2021 डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कुछ हद तक विनियमित तो करते हैं, लेकिन जमीन पर सक्रिय इन वसूलीबाजों पर सीधे लगाम लगाने में विफल रहे हैं। वर्तमान में इन तत्वों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के तहत रंगदारी, धोखाधड़ी या मानहानि के सामान्य आपराधिक मामले ही दर्ज हो पाते हैं, जिनकी लंबी कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठाकर ये अपराधी कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं। पत्रकारिता की आड़ में फल-फूल रहे इस संगठित अपराध को रोकने के लिए अब सामान्य धाराओं के बजाय एक विशिष्ट और कठोर विधिसम्मत कानून की आवश्यकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय संविधान की आत्मा है, लेकिन ब्लैकमेलिंग और आपराधिक गतिविधियों को इस अधिकार की आड़ में फलने-फूलने की अनुमति कभी नहीं दी जा सकती। अतः सरकार को इस दिशा में एक धारदार और प्रभावी कानूनी ढांचा तैयार करना होगा, जिसके तहत डॉक्टरों या वकीलों की तर्ज पर पत्रकारों के लिए भी एक वैधानिक केंद्रीय मीडिया काउंसिल का गठन किया जाना अनिवार्य है। इस कानून के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को तब तक पत्रकार के रूप में काम करने या प्रेस कार्ड जारी करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, जब तक वह किसी मान्यता प्राप्त और पंजीकृत मीडिया संस्थान से प्रमाणित न हो। इसके साथ ही, बिना किसी नियंत्रण के चल रहे यूट्यूब चैनलों और फेसबुक न्यूज पेजों का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक केंद्रीकृत पोर्टल पर अनिवार्य पंजीकरण होना चाहिए, जहां उनके वित्तीय स्रोतों और फंडिंग का पूरा ब्योरा पारदर्शी रूप से दर्ज हो। 
स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन और जनसंपर्क अधिकारियों की लिखित अनुमति के बिना वाहनों पर ‘प्रेस’ के स्टीकर लगाने को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया जाना चाहिए। अवैध रूप से प्रेस कार्ड छापने वाली संस्थाओं पर भारी जुर्माने के साथ जेल का प्रावधान अपेक्षित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारिता की आड़ में रंगदारी और ब्लैकमेलिंग करने वाले मामलों को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखकर त्वरित अदालतों (फास्ट-ट्रैक कोर्ट) के माध्यम से निपटाया जाए। लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, प्रेस के नाम पर चल रहे इस आपराधिक गठजोड़ की सर्जरी करना आज उससे कहीं ज्यादा अनिवार्य हो चुका है। इसके अलावा जो लोग इन फर्जी पत्रकारों के शिकार होते है, उनको आगे आने की जरूरत है ।

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