पत्रकार संघों ने फर्जी प्रेस कार्डों के बढ़ने पर जताई चिंता, कहा कि प्रेस पर भरोसा खत्म हो रहा

AYUSH ANTIMA
By -
0
 

  


जयपुर/दिल्ली: नवंबर 2025 में एक व्यक्ति तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आया और मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बीच चुपचाप बैठ गया, ज्यादा देर नहीं लगी कि रिपोर्टरों को कुछ गड़बड़ का अहसास हुआ। पुलिस को बुलाया गया और उस व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया। आरोप था कि वह पत्रकार होने का ढोंग कर रहा था और उसके पास कई राष्ट्रीय न्यूज संगठनों के लोगो वाले माइक थे। यह घटना भारत भर में सामने आ रहे ऐसे मामलों में से एक है, जहां लोग कथित तौर पर पत्रकार होने का ढोंग कर रहे हैं। फर्जी प्रेस कार्ड या बिना रेगुलेशन वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर पहुंच बना रहे हैं, गलत जानकारी फैला रहे हैं या पैसा ऐंठ रहे हैं। मीडिया संगठन और पत्रकार चेतावनी दे रहे हैं कि इस चलन से जनता का भरोसा टूट रहा है और असली पत्रकारों के लिए काम करना मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ सालों में यह समस्या तेजी से बढ़ी है। पहले नकली पत्रकार उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन आज हर जिले और तहसील में 10-20 यूट्यूब न्यूज चैनल और बिना रजिस्ट्रेशन वाले प्रेस क्लब या पत्रकार संगठन खुल रहे हैं। 1500-2000 रुपये में प्रेस कार्ड बन रहे हैं। इसमें सबसे बड़ा नुकसान पेशे की साख को हुआ है। जब कोई न्यूज रिपोर्टर रिश्वत लेते पकड़ा जाता है तो लोग असली पत्रकारों को भी 'पैसा मांगने वाला' समझने लगते हैं। जनता, पुलिस और प्रशासन अब हर पत्रकार को शक की नजर से देखते हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग करना मुश्किल हो गया है। सीधे शब्दों में कहें तो 'प्रेस' शब्द की साख दांव पर लग गई है।"

*नकली पत्रकारों के 03 बड़े वर्ग*
1. जो नकारात्मक खबर चलाने की धमकी देकर पैसा ऐंठते हैं।
2. जो चुनाव के दौरान प्रेस क्रेडेंशियल का इस्तेमाल कर राजनीतिक पहुंच बनाते हैं।
3. बिना वेरिफिकेशन वाले यूट्यूब क्रिएटर जो बिना तथ्य जांचे सनसनीखेज कंटेंट प्रकाशित करते हैं।
डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म बनाने की कम लागत और वेरिफिकेशन का अभाव ही इस समस्या की जड़ है। सरकार और पत्रकार संगठनों को मिलकर असली पत्रकारों का एक सरकारी पोर्टल बनाना चाहिए। हर प्रेस कार्ड क्यूआर कोड से वेरिफाई होना चाहिए। द हिंदू के राजनीतिक संपादक और हैदराबाद प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष रविकांत रेड्डी ने भी इन चिंताओं से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पत्रकार की पहचान का दुरुपयोग पहले से कहीं आसान कर दिया है। आज कोई भी वेब पोर्टल, ऑनलाइन अखबार या यूट्यूब चैनल शुरू कर सकता है क्योंकि इसके लिए लगभग कोई रेगुलेटरी जरूरत नहीं है। कुछ लोग पत्रकारिता से जुड़े सम्मान और प्रभाव का इस्तेमाल ब्लैकमेल या अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए करते हैं, जिससे पेशे की छवि खराब होती है। उन्होंने बताया कि प्रिंट प्रकाशनों को RNI-रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज पेपर्स फॉर इंडिया में रजिस्टर करना जरूरी है, लेकिन डिजिटल प्रकाशकों के लिए ऐसा कोई ढांचा नहीं है।
टेक्नोलॉजी ने समस्या और बढ़ा दी है। अब लोग प्रतिष्ठित अखबारों के फ्रंट पेज नकली बना लेते हैं या फर्जी डिजिटल रिपोर्ट बनाकर लोगों को बदनाम करते हैं या अधिकारियों को ब्लैकमेल करते हैं। रेड्डी का मानना है कि पत्रकारिता के लिए मजबूत संस्थागत निगरानी जरूरी है।
लंबे समय का एकमात्र समाधान पत्रकारिता के लिए एक उचित रेगुलेटरी ढांचा है। जैसे कानून या चार्टर्ड अकाउंटेंसी के रेगुलेटरी बॉडी होते हैं, वैसे ही पत्रकारिता का भी होना चाहिए। कोयंबटूर के पुलिस आयुक्त डॉ.एन.कन्नन ने जनता से अपील की कि वे पत्रकार बनकर धोखा देने वालों के मामलों को नजरअंदाज न करें, बल्कि रिपोर्ट करें। जब भी पीड़ित सामने आते हैं तो पुलिस केस दर्ज करती है, लोगों को ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करनी चाहिए न कि नजरअंदाज करना चाहिए। जैसे-जैसे ज्यादा शिकायतें आएंगी और नकलचियों व जानबूझकर झूठी जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई होगी, इन अपराधों को काबू किया जा सकेगा। उन्होंने माना कि फर्जी पहचान और गुमनाम ऑनलाइन अकाउंट जांच को मुश्किल बनाते हैं, जबकि गलत जानकारी अक्सर आधिकारिक स्पष्टीकरण से तेज फैलती है।
हालांकि पत्रकारों के लिए चिंता सिर्फ व्यक्तिगत मामलों से बड़ी है। उनका कहना है कि हर फर्जी प्रेस कार्ड, हर फर्जी न्यूज पोर्टल और वसूली का हर मामला असली पत्रकारिता पर जनता के भरोसे को कमजोर करता है। जैसे-जैसे डिजिटल प्रकाशन आसान हो रहा है और एंट्री की बाधाएं कम हो रही हैं, उनका तर्क है कि पेशे की साख बचाना प्रेस की स्वतंत्रता बचाने जितना ही जरूरी हो गया है।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!