लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिकता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। यह जनता और सरकार के बीच आवश्यक सेतु के रूप में कार्य करती है। इसका मुख्य कार्य नागरिकों को उनके मूलभूत अधिकारों को लेकर जागृत करना, सत्ताधारियों को जबाबदेह ठहराना और सार्वजनिक मुद्दों पर सार्थक बहस को बढ़ावा देना है। पत्रकारिता सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं, नीतियों और फैसलों को आमजन तक पहुंचाती है और बदले में जनता की समस्याओं, शिकायतों और विचारो को सरकार के संज्ञान में लाती है। स्वतन्त्र प्रेस सरकार के कामकाज पर नजर रखती है। यह भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरूपयोग और मानवाधिकारो के उल्लघंन को उजागर करके शासको को पारदर्शी और नैतिक बने रहने के लिए बाध्य करती है। पत्रकारिता समाज में खुले संवाद, आलोचनात्मक सोच और बहस के लिए एक मंच प्रदान करती है। इसमें विभिन्न दृष्टिकोण जनता के सामने आते हैं, जो लोकतांत्रिक निर्णय प्रकिया को मजबूत करते हैं। उपरोक्त बातो को लेकर यदि डिजिटल मिडिया के युग में देखें तो पत्रकारिता रसातल में चली गई है। यूट्यूब चैनल चलाने वाले एक बढ़िया मोबाईल व माउथ पीस लेकर पत्रकारिता के पर्याय बने घूम रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने डिजिटल पत्रकारिता के दौर में बढ़ते स्वघोषित पत्रकारों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मोबाईल और माउथ पीस रखने वाला लगभग हर व्यक्ति खुद को पत्रकार बताने लगे हैं। जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने कहा कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है लेकिन इसका उपयोग गैर जिम्मेदाराना, भ्रामक या डराने धमकाने वाली पत्रकारिता के लिए ढाल के रूप मे नही किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल और सोशल मीडिया पर बिना प्रशिक्षण व जवाबदेही से की जा रही पत्रकारिता से समाज मे साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा है। इस संदर्भ में अदालत ने सरकार को प्रेस की स्वतंत्रता व पेशेवर जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने वाला एक कानून/नियामक ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया। अदालत ने यह टिप्पणी सीमापुरी के एक मामले में यूट्यूब कंटेंट क्रियेटर पर कथित हमले में आरोपियों को जमानत देते हुए कही। वर्तमान में इस अर्थ युग की अंधी दौड़ ने पत्रकारिता के मूल्यों को रसातल में भेजने का काम किया है, जिसमें अहम भूमिका इन कथित पत्रकारों की है, जो बिना रजिस्ट्रेशन व आरएनआई नंबर के पत्रकारिता करते नजर आते हैं। इसमे स्थानीय प्रशासन को भी ध्यान देने की जरूरत है कि किसी सरकारी कार्यक्रमों की कवरेज के लिए इनको तवज्जो न दी जाए। पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने के लिए सरकार को कठोर कदम उठाने होंगे और इन स्वघोषित पत्रकारों पर अंकुश लगाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था व लोकतंत्र को बचाना होगा।
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