एक लोकतांत्रिक देश में यह हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, जो भारतीय संविधान की अनुच्छेद 19(1)(ए) सरकार की नीतियों की आलोचना करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार स्पष्ट कर चुका है कि केवल सरकार या उसकी विचारधारा से असहमति होना या आलोचना करना राष्ट्र विरोधी कृत्य नहीं है। अक्सर राजनीतिक मतभेदों या किसी हिंसक घटना के कारण शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और असामाजिक तत्वों के बीच की रेखा धुंधली होने से वह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। जनहित के मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले नागरिक आतंकवादी नहीं होते लेकिन यदि कोई समूह या व्यक्ति विरोध की आड़ में हिंसा फैलाता है, सरकारी संपतियों को नुकसान पहुंचाता है या देश की सुरक्षा को खतरे में डालता है तो ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्वों को कानून के तहत अलग श्रेणी में रखा जाता है।
सन् 2014 के बाद राष्ट्रवाद व राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा देखने को मिली है। विश्व की सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय वाट्सएप यूनिवर्सिटी में उन्हीं छात्रों को प्रवेश दिया जाता है, जो सिर्फ हिन्दू मुस्लिम की बात करने के साथ ही सनातन धर्म पर संकट की बात करें कि 2014 के बाद ही देश आजाद हुआ है व सनातन को बचाने वालो का भी 2014 के बाद ही उदय हुआ है। युवा पीढ़ी को धर्म की अफीम का इतना आदी बना दिया गया है कि सनातन धर्म की ध्वजा उन्हीं वाट्सएप यूनिवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण करने वालो के हाथों में सुरक्षित है। 2014 के बाद सरकार की नितियों पर सवाल उठाने और असहमति व्यक्त करने को राष्ट्रद्रोह की परिधि में रखने का नेगेटिव व्यापक रूप से उभरा है। किसी जनहित के मुद्दे पर आंदोलन करने वालो को चीन या पाकिस्तान कनेक्शन का तुरंत पता लग जाता है और उसको किस देश से फंडिंग हो रही है, उसका विवरण तुरंत सार्वजनिक करने मे देरी नहीं होती जबकि पुलवामा हमले में आरडीएक्स कहां से व किस रास्ते से आया, उसका आज तक पता नहीं चला है।
कांग्रेस शासन में रात को माननीय कोर्ट में सुनवाई को लेकर कांग्रेस तंज कसती रही है लेकिन भाजपा सरकार में भी रविवार को अवकाश के दिन भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक की पत्नी की याचिका पर सुनवाई की गई तो इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर महिमान्वित कर रहे हैं। देश में किसान जब अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करें तो आतंकवादी व खालिस्तानी, महिला पहलवान जब उत्पीड़न को लेकर भूख हड़ताल करे तो आतंकवादी करार देना वाट्सएप यूनिवर्सिटी पढ़ने वाले उन्हें आतंकवादी करार देते हैं। युवा शक्ति किसी भी देश की रीढ़ होती है और जब उन्हीं के सपनो पर कुठाराघात किया जाए व पेपर लीक को लेकर युवा अपनी जान दे तो किसी भी सरकार के लिए शोभनीय नहीं कहा जा सकता है। उससे भी ज्यादा अशोभनीय व्यवहार तब हो जाता है, जब युवा अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करें और उनको चीन व पाकिस्तान समर्थक कहा जाए। सरकार कोई भी हो प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंकों का खेल होती है और आंदोलन करने वालों से वार्ता करना ही एकमात्र हल है न कि अहंकारपूर्ण रवैया अपनाकर उनको जलील किया जाए।