गुरु उच्च के, शुक्र अनुकूल, सूर्य शक्तिशाली... फिर भी सफलता क्यों नहीं

AYUSH ANTIMA
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वर्तमान समय में ज्योतिष प्रेमियों के बीच एक विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। देवगुरु बृहस्पति कर्क राशि में उच्च के होकर विराजमान हैं। शुक्र अनुकूल स्थिति में हैं। बुध बुद्धि, व्यापार और संचार को बल प्रदान कर रहे हैं तथा 15 जून को सूर्य देव मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके हैं। ग्रहों की यह स्थिति अनेक दृष्टियों से शुभ मानी जा रही है। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब ग्रह इतने अनुकूल हैं तो फिर बहुत से लोगों को सफलता क्यों नहीं मिल रही क्यों कुछ लोग जीवन में निरंतर प्रगति कर रहे हैं जबकि कुछ लोग शुभ ग्रहों और अच्छे योगों के बावजूद संघर्ष कर रहे हैं। इस प्रश्न का उत्तर केवल ज्योतिष में ही नहीं, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता में भी छिपा हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा था-"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। यही गीता का सार है और यही ज्योतिष का भी मूल सिद्धांत है।

*ग्रह क्या करते हैं*

बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि शुभ ग्रहों का अर्थ निश्चित सफलता है लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है। ग्रह सफलता नहीं देते, बल्कि सफलता के अवसर प्रदान करते हैं। ग्रह परिस्थितियाँ बनाते हैं, संकेत देते हैं और सही दिशा दिखाते हैं लेकिन उन अवसरों का लाभ उठाना मनुष्य के कर्म पर निर्भर करता है। यदि कोई व्यक्ति शुभ ग्रहों के होते हुए भी प्रयास नहीं करता तो ग्रह भी उसका भला नहीं कर सकते।

*बृहस्पति उच्च के हैं, इसका क्या अर्थ है*

देवगुरु बृहस्पति का कर्क राशि में उच्च का होना ज्ञान, शिक्षा, धर्म, परिवार, मार्गदर्शन और उन्नति के नए अवसर प्रदान करता है। यह समय विद्यार्थियों, शिक्षकों, सलाहकारों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक साधकों के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना जाता है लेकिन यदि विद्यार्थी पढ़ाई ही न करे, शिक्षक स्वयं अध्ययन न करे या व्यक्ति आत्मविकास का प्रयास न करे, तो उच्च का बृहस्पति भी अपना पूर्ण शुभ फल नहीं दे पाएगा। गुरु ज्ञान का द्वार खोल सकता है, लेकिन उस द्वार से होकर गुजरना स्वयं व्यक्ति को पड़ता है।

*शुक्र अनुकूल हैं, फिर भी सुख क्यों नहीं*

शुक्र भौतिक सुख, वैवाहिक जीवन, कला, सौंदर्य और संबंधों के कारक ग्रह माने जाते हैं। वर्तमान समय में शुक्र का प्रभाव पारिवारिक जीवन और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का संकेत देता है किन्तु यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में अहंकार, कटुता और स्वार्थ को स्थान देता है, तो शुक्र का शुभ प्रभाव भी सीमित हो जाता है।
शुक्र अवसर देता है कि संबंध बेहतर हों, लेकिन उन्हें निभाना मनुष्य का कर्म है।

*सूर्य शक्तिशाली हैं, फिर भी सम्मान क्यों नहीं*

15 जून को सूर्य देव मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके हैं। सूर्य आत्मविश्वास, नेतृत्व, प्रतिष्ठा और सरकारी क्षेत्र के कारक ग्रह माने जाते हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि सूर्य के बलवान होने से स्वतः सम्मान और पद प्राप्त हो जाएगा परंतु ऐसा नहीं है। सम्मान पाने के लिए चरित्र चाहिए, प्रतिष्ठा पाने के लिए परिश्रम चाहिए, नेतृत्व पाने के लिए जिम्मेदारी चाहिए। सूर्य केवल ऊर्जा और आत्मविश्वास देता है, उसका उपयोग करना व्यक्ति के हाथ में होता है।

*बुध का गोचर और कर्म का संदेश*

बुध बुद्धि, व्यापार, लेखन, संचार, प्रबंधन और तकनीकी कौशल का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान समय में बुध नई योजनाएँ बनाने, सीखने और व्यापार विस्तार के लिए अनुकूल संकेत दे रहा है लेकिन यदि कोई व्यापारी नई योजना ही न बनाए, कोई विद्यार्थी अध्ययन न करे और कोई लेखक लेखन का अभ्यास न करे, तो बुध का शुभ प्रभाव भी निष्फल हो सकता है। यही कारण है कि एक ही ग्रह गोचर में कुछ लोग असाधारण सफलता प्राप्त करते हैं और कुछ लोग कोई विशेष लाभ नहीं ले पाते।

*ज्योतिष का वास्तविक उद्देश्य*

ज्योतिष का उद्देश्य लोगों को भाग्यवादी बनाना नहीं है। ज्योतिष का उद्देश्य यह बताना है कि कौन-सा समय किस प्रकार के कर्म के लिए अनुकूल है। जब बृहस्पति मजबूत हो तो ज्ञान अर्जित करें, जब बुध मजबूत हो तो व्यापार और अध्ययन बढ़ाएँ, जब शुक्र अनुकूल हो तो संबंधों को सुदृढ़ करें, जब सूर्य शक्तिशाली हो तो नेतृत्व और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। अर्थात ग्रहों के संकेतों को समझकर उसी दिशा में कर्म करना ही ज्योतिष का वास्तविक लाभ है।

"गुरु अवसर देता है, बुध योजना देता है, शुक्र प्रेरणा देता है, सूर्य आत्मविश्वास देता है; लेकिन सफलता केवल कर्म देता है।"

"ग्रह गोचर अवसरों का निर्माण करते हैं लेकिन कर्म उन्हें उपलब्धियों में परिवर्तित करता है।"

"भाग्य द्वार खोलता है, मंजिल तक कर्म पहुँचाता है।"

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