दल-बदल जनादेश का अपमान

AYUSH ANTIMA
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दल-बदल उस जनादेश का खुला उल्लघंन ही नहीं उसका अपमान भी है, जो जनता किसी विशेष दल, विशेष व्यक्ति, विचारधारा और वादों के आधार पर अपने जन प्रतिनिधि का चयन करती है।‌ जब विधायक और सांसद व्यक्तिगत लाभ, सत्ता सुख या प्रलोभन के लिए पार्टी बदलते है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है। पार्टी बदलने से उन मतदाताओ के विश्वास की हत्या होती है, जिसको लेकर उन्होंने उसको विजयी बनाया था। दल-बदल की यह व्यवस्था अवसरवादिता को बढ़ावा देती है और राजनेताओं की जनता के प्रति जवाबदेही को व्यक्तिगत स्वार्थों की ओर मोड़ देती है। इसके लिए 1985 में 52वे संविधान संशोधन के माध्यम से इसे संविधान की दसवीं अनुसूचि में शामिल किया गया था। मूल रूप से इस नये दल-बदल कानून में व्यवस्था थी कि यदि कुल संख्या बल का एक तिहाई हिस्सा अलग होता है तो इसे विलय माना जायेगा। बाद में 2003 में इस सीमा को बढ़ाकर दो तिहाई कर दिया गया। दल-बदल पर निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष/स्पीकर के पास होता है, जो अक्सर सत्ताधारी दल से जुड़े रहने के कारण इसमें पक्षपात की संभावनाएं बनी रहती है। इस दल-बदल कानून को यदि कानून के साये में राजनीतिक डकैती कहे तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। वर्तमान में संविधान की यह दसवीं अनुसूची लोकतंत्र की अर्थी निकालने का माध्यम बन चुकी है। वर्तमान दल-बदल कानून को लेकर यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि कानून उपयोगी है तो वह उस सभा का अंग है, जिसमें द्रोपदी का चीरहरण हुआ था। यह कानून उस सड़े हुए तन्त्र का हिस्सा है, जिसको हमारे राजनेताओं ने लोकतंत्र का नाम दे रखा है। यह कैसी विडम्बना है कि थोक के भाव में दल-बदल को कानूनी मान्यता है और खुदरा दल-बदल कानून के दायरे में आता है और उसकी सदस्यता खत्म हो जाती है। यह दल-बदल कानून दल-बदल को रोकता नहीं बल्कि उसको कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। भारतीय राजनीति में बिकने वाले उत्पादों की कतार लगी हुई है, जिनकी कीमत सत्ता की मलाई खाने से लेकर जांच एजेंसियों से बचना है। जनता जिनको चुनकर सांसद या विधायक बनाती है वे एक मंडी में खड़े होकर नीलाम हो जाते हैं, जो जनता के विश्वास का चीरहरण है। यह दल-बदल कानून सत्ता के भूखे उन राजनेताओं को पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है क्योंकि उनको जनादेश से कोई लेना-देना नहीं होता है। यदि देश के सभी राजनीतिक दल इस कैंसर से छुटकारा पाने के इच्छुक हैं तो एक ऐसा दल-बदल को लेकर कानून बनाए कि चाहे संख्या बल कितना भी हो, उनकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म होने के साथ ही उन पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।

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