चिकित्सक पावरफुल है या सरकार: चिकित्सा विभाग दे स्पष्टीकरण

AYUSH ANTIMA
By -
0



राजस्थान सरकार बरसों से ढोल पीट रही है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जेनरिक दवाएं मिल रही हैं। मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना का पूरा ढांचा इसी एक संकल्प पर टिका था कि गरीब मरीज को फार्मा कंपनियों और महंगी ब्रांडेड दवाओं के मकड़जाल से बाहर निकाला जाए लेकिन आज सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि जब सरकार की घोषित नीति जेनरिक दवाओं की है, तो सरकारी अस्पतालों के पर्चों पर आज भी ब्रांडेड दवाओं का दबदबा किसके इशारे पर कायम है। ​वर्ष 2011 में जब इस योजना की शुरुआत हुई, तो लगा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई बड़ी क्रांति होने वाली है। सरकार ने जेनरिक दवाओं की खरीद और वितरण के लिए बकायदा एक समानांतर व्यवस्था खड़ी की और आंकड़े गवाह हैं कि करोड़ों मरीजों ने कागजों पर इसका लाभ भी उठाया लेकिन अस्पतालों के गलियारों में पैर रखते ही सरकारी दावों का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है क्योंकि आज भी डॉक्टरों की कलम से साल्ट का नाम नहीं, बल्कि सीधे रसूखदार कंपनियों के ब्रांड नेम टपक रहे हैं। नतीजा यह होता है कि लाचार मरीज को बाहर के मेडिकल स्टोर पर जाकर वही दवा कई गुना ऊंचे दामों पर खरीदनी पड़ती है, जिससे यह साफ है कि इस खेल में मरीज को नहीं बल्कि किसी और को फायदा पहुंचाया जा रहा है। ​जब बाजार में पैंटोप्राजोल, मेटफॉर्मिन, टेल्मिसार्टन, एटोरवास्टेटिन या एजिथ्रोमाइसिन जैसी रोजमर्रा की बेहद जरूरी दवाओं के सस्ते जेनरिक विकल्प मौजूद हैं, तो किसी खास ब्रांड का नाम लिखने के पीछे की मजबूरी समझ से परे है। जो दवा मरीज को 20 से 30 रुपये में मिल जानी चाहिए, उसी का विकल्प 150 से 300 रुपये में बेचा जा रहा है। इसका सीधा खामियाजा उस गरीब, किसान, मजदूर और बुजुर्ग को भुगतना पड़ रहा है, जो इस उम्मीद में अस्पताल आया था कि उसका इलाज कम खर्च में हो जाएगा। पर्ची पर लिखा ब्रांडेड नाम उसकी जेब पर ऐसा घाव देता है, जो कई बार बीमारी से भी ज्यादा दर्दनाक साबित होता है।
​सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस पूरे खेल से स्वास्थ्य विभाग अनजान नहीं है। जनवरी 2026 में चिकित्सा विभाग ने बकायदा एक चेतावनी जारी करते हुए डॉक्टरों को हिदायत दी कि वे आवश्यक दवा सूची से बाहर की दवाएं न लिखें, वरना उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। दवा न होने पर अस्पताल उसे खुद स्थानीय स्तर पर खरीदकर मरीज को मुफ्त देगा। अब जनता यह पूछती है कि अगर सब कुछ नियमों के अनुसार चल रहा था, तो अचानक इस चेतावनी की नौबत क्यों आई। सबसे अहम बात यह कि इस तथाकथित सख्त आदेश के बाद वाकई कितने डॉक्टरों पर गाज गिरी।
​सरकारी फाइलों को खंगालिए तो जेनरिक दवाओं के समर्थन में आदेशों का अंबार लगा मिलेगा और राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक डॉक्टरों को सिर्फ साल्ट नेम लिखने के अनगिनत निर्देश जारी हो चुके हैं लेकिन अगर इसके बावजूद अस्पतालों में धड़ल्ले से ब्रांडेड दवाएं लिखी जा रही हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि या तो डॉक्टरों की नजर में इन आदेशों की हैसियत रद्दी के टुकड़े से ज्यादा नहीं है या फिर विभाग का मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह से लकवा ग्रस्त हो चुका है। स्वास्थ्य विभाग में अगर थोड़ी भी पारदर्शिता बची है, तो वह पिछले पांच वर्षों का कच्चा चिट्ठा सार्वजनिक करे और जनता को बताए कि आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाले कितने डॉक्टरों को नोटिस दिए गए और कितनों को वाकई दंडित किया गया। ​राजस्थान की निशुल्क दवा योजना देश के लिए एक नजीर हो सकती थी लेकिन सरकारी कुर्सियों पर बैठे कुछ चिकित्सकों का आचरण इस पूरी लोक-कल्याणकारी योजना की आत्मा को मार रहा है। एक गरीब मरीज आज हक से यह जानना चाहता है कि सरकारी अस्पताल का डॉक्टर सरकार की जनहितैषी नीति को लागू करने के लिए बैठा है या फिर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की बिक्री बढ़ाने का जरिया बन चुका है। जब खजाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हों, तब भी अगर मरीज को अपनी जेब खाली करनी पड़े, तो यह सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं बल्कि जनता के भरोसे के साथ किया गया क्रूर विश्वासघात है। स्वास्थ्य विभाग अब कागजों पर नए फरमान जारी करना बंद करे और गुनहगारों पर की गई कार्रवाई की सूची सार्वजनिक करे, क्योंकि अब आम आदमी के मन में यह धारणा पत्थर की लकीर बन चुकी है कि जेनरिक के नाम पर नीति भले ही सरकार की हो, लेकिन भीतर ही भीतर तिजोरियां किसी और की भरी जा रही हैं।
*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर*

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!