भाजपा जिलाध्यक्ष की पार्टी के कार्यक्रमों के प्रति उदासीनता

AYUSH ANTIMA
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भारतीय जनता पार्टी 25 जून को आपातकाल की बरसी पर काला दिवस या संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाती रही है। इस दिन पार्टी पूरे प्रदेश में विभिन्न कार्यक्रमों व संगोष्ठियों का आयोजन कर जिला स्तर पर 1975 के आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा लोकतंत्र की हत्या और नागरिक अधिकारों के हनन के रूप में याद करती रही है। भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्तर व प्रदेश स्तर से लेकर जिला मुख्यालयों तक के कार्यकर्ता इस दिन को काले अध्याय के रूप में याद करते हैं। इसके साथ ही आपातकाल का विरोध करने वाले लोकतंत्र सैनानियों और सेनानियों के परिवारों को सम्मानित किया जाता है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस ने सत्ता के लालच में नागरिक अधिकारों व लोकतंत्र को आपातकाल के पैरो तले कुचल दिया था। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह कांग्रेस के नेता व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जिस तरह से संविधान की एक किताब हाथ में लिए घूम रहे हैं, शायद उनको वह काला दिन याद नहीं कि उनकी दादी इंदिरा गांधी ने किस तरह संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों को सीमित कर दिया था। सत्ता प्राप्ति का यह अनूठा उदाहरण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पेश किया था। देश में आपातकाल के दौरान झुंझुनूं जिले के भी बहुत से नेताओ ने यातना झेली थी व नजरबंद करके जेल की काल कोठरी में डाल दिया लेकिन झुनझुनु भाजपा जिलाध्यक्ष ने आपातकाल की बरसी पर 25 जून को एक भी कार्यक्रम न करके पार्टी लाईन से हटकर केवल अन्य जगहों पर किए गये आयोजनों को अपनी सोशल मिडिया में शेयर करके आयोजन की इतिश्री कर ली। जिला मुख्यालय पर आपातकाल की बरसी पर जिला संगठन द्वारा एक भी कार्यक्रम न करना व जिन कर्मवीरो ने यातनाएं सही, उनको याद करना नागवार समझा। जिले पर ऐसा आयोजन न होना, इस बात का संकेत भी है कि भाजपा जिला संगठन अपनी हठधर्मिता व मनमाने ढंग से संगठन की कमान संभाल रही हैं। आयातित कार्यकर्ताओं को तवज्जो देना व भाजपा के निष्ठावान व सिध्दांतों के प्रति समर्पण भाव रखने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है। यह भाजपा प्रदेश नेतृत्व का विशेषाई एकाधिकार है कि जिले की कमान किसको सौपे लेकिन यह कार्यशैली पर जो सवाल उठते रहे हैं, उनका जबाब प्रदेश नेतृत्व को देना होगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो जनता जबाब देने में सक्षम है क्योंकि वैसे भी जिले मे भाजपा की स्थिति कोई खास नहीं है और आगामी पंचायत व नगर निकाय चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना होगा। जिन कार्यकर्ताओं के नाम भाजपा की सरल एप पर पदाधिकारी के रूप में चल रहे हैं, उनकी नियुक्ति नहीं करना उनकी हठधर्मिता का जीता जागता उदाहरण है। मिडिया प्रबंधन के मोर्चे पर भी जिलाध्यक्ष विफल रही है, जिसका नमूना अखबारों में प्रकाशित खबरों को देखने से मिला कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस का अपहरण कर उसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय बलिदान दिवस में तब्दील कर दिया, जो पूरे जिले में चर्चा का विषय होने के साथ ही भाजपा संगठन की किरकिरी वाला कृत्य है। यह उसी मनमानी का प्रदर्शन है कि अधिकृत मिडिया प्रभारी को दरकिनार कर अन्य स्रोतों से मिडिया को प्रेस नोट भेजने के मामले प्रकाश में आते हैं।

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