मर्द को भी दर्द होता है, मर्द को दर्द नहीं होता। लड़के रोते नहीं हैं। ये वाक्य हम सभी ने कभी न कभी सुने हैं। इतना ही नहीं, ये हमारे समाज और परवरिश का हिस्सा बन चुके हैं। बचपन से लड़कों को सिखाया जाता है कि उन्हें मजबूत बनना है, अपने आँसू छिपाने हैं और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना है। धीरे-धीरे वे सीख जाते हैं कि दुख, डर, असुरक्षा या कमजोरी को व्यक्त नहीं करना है लेकिन क्या भावनाएँ व्यक्त करना कमजोरी है। जून का महीना मेंस मेंटल अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना किसी और का। पुरुष भी तनाव, चिंता, अकेलापन, असफलता का भय, रिश्तों की चुनौतियाँ और जीवन के दबावों का सामना करते हैं। फर्क केवल इतना है कि उन्हें अक्सर अपनी भावनाओं के बारे में बात करना सिखाया ही नहीं जाता। शायद यही कारण है कि बड़े होने पर कई पुरुष अपने रिश्तों में भावनात्मक रूप से उपलब्ध (इमोशनली अवेलेबल) होना नहीं सीख पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि वे प्रेम नहीं करते या अपने परिवार की परवाह नहीं करते। बल्कि कई बार उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि अपनी भावनाएँ कैसे व्यक्त करें, किसी और की भावनाओं को कैसे सुनें या भावनात्मक जुड़ाव कैसे बनाएं। हमारे समाज में पुरुषों को समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना सिखाया जाता है, लेकिन भावनाओं को समझना नहीं। इसलिए जब कोई साथी, बच्चा या परिवार का सदस्य अपनी तकलीफ साझा करता है, तो वे अक्सर तुरंत सलाह देने लगते हैं, जबकि कई बार सामने वाले को समाधान नहीं, बल्कि समझे जाने की आवश्यकता होती है।
भावनात्मक रूप से उपलब्ध होने का पहला कदम है अपनी भावनाओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना। "मैं ठीक हूँ" कहने के बजाय यह समझना कि मैं दुखी हूँ, चिंतित हूँ, निराश हूँ या थका हुआ हूँ। दूसरा कदम है अपनी भावनाओं को शब्द देना और उन्हें सुरक्षित रिश्तों में साझा करना। इसके साथ ही दूसरों की भावनाओं को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है। भावनाओं को सही या गलत ठहराने के बजाय उन्हें समझना और सम्मान देना रिश्तों को गहरा बनाता है। "तुम इतना क्यों सोच रहे हो" कहने के बजाय "मैं समझ सकता हूँ कि यह तुम्हारे लिए कठिन होगा" कहना भावनात्मक सुरक्षा का एहसास कराता है।
आज आवश्यकता ऐसे समाज की है, जहाँ पुरुषों को केवल मजबूत बनने की नहीं, बल्कि संवेदनशील होने की भी अनुमति मिले। जहाँ बेटों को यह सिखाया जाए कि रोना सामान्य है, मदद माँगना साहस है और अपनी भावनाओं को व्यक्त करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की निशानी है। इस मेंस मेंटल हैल्थ अवेयरनेस मंथ पर आइए, हम उन पुरानी धारणाओं को चुनौती दें, जो पुरुषों को अपनी भावनाओं से दूर करती हैं। आइए, हम अपने बेटों, भाइयों, मित्रों, पतियों और पिताओं को यह संदेश दें कि वे केवल जिम्मेदारियाँ निभाने वाली मशीनें नहीं हैं, बल्कि भावनाओं से भरे इंसान हैं क्योंकि सच यही है—मर्द को भी दर्द होता है और उस दर्द को सुनना, समझना और स्वीकार करना हम सभी की जिम्मेदारी है।