झुंझुनूं भाजपा संगठन की अपने महानायको के प्रति असंवेदनशीलता का परिचय

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान भारतीय जनता पार्टी ने पूरे राजस्थान में पार्टी के महानायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर उनके विचारों को संगोष्ठी के आयोजनों द्वारा कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने का निर्णय लिया। इसको लेकर प्रदेश नेतृत्व में हर जिले से संयोजको व सह संयोजको की नियुक्तियां भी की। यह आयोजन झुंझुनूं मुख्यालय पर भी जिला संगठन, जो आईसीयू में है उसके संयोजन में हुआ। आईसीयू को सुनकर चौकने जैसी कोई बात नहीं लेकिन प्रदेश महामंत्री के मुख्य आतिथ्य व जिलाध्यक्ष की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन की अखबाऱ में प्रकाशित खबर को देखकर उपरोक्त बात सही साबित होती है। झुंझुनूं भाजपा संगठन की असंवेदनशीलता और जिलाध्यक्ष की संगठन पर पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रेस नोट में इसको पंडित दीनदयाल उपाध्याय बलिदान दिवस में तब्दील कर दिया गया। जिले में इस चूक को लेकर आम चर्चा तो है ही बल्कि भाजपा के लिए असहज की स्थिति बन गई कि आखिर यह प्रेस नोट समाचार पत्र को किसने भेजा। विदित हो झुनझुनु में अधिकृत मिडिया प्रभारी की नियुक्ति हो रखी है लेकिन भाजपा जिलाध्यक्ष की हठधर्मिता के चलते अनाधिकृत व्यक्ति को प्रेस नोट भेजने के लिए अधिकृत कर रखा है। कल के समाचार पत्र में छपे समाचार से भाजपा संगठन की बहुत किरकिरी हुई है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस को पंडित दीनदयाल उपाध्याय बलिदान दिवस में तब्दील कर दिया गया। वैसे तो यह प्रदेश नेतृत्व का विशेषाधिकार है कि वह इसको कितनी गंभीरता से लेता है लेकिन भाजपा जिलाध्यक्ष की हठधर्मिता व संगठन पर एकाधिकार का एक नमूना यह भी है कि यदि सूत्रों की मानें तो शहर मंडल अध्यक्ष को लेकर भाजपा के सरल एप पर जिस कार्यकर्ता का नाम अंकित है, उसको जिलाध्यक्ष नियुक्ति पत्र नहीं दे रही। उस कार्यकर्ता को नियुक्ति पत्र आखिर क्यों नहीं दिया गया। जब अधिकृत रूप से मिडिया प्रभारी की नियुक्ति है तो जिलाध्यक्ष की क्या मजबूरी है। संगठन के द्वारा आयोजित होने वाले आयोजनो का प्रेस नोट अनाधिकृत व्यक्ति समाचार पत्रों को भेजे। यह चूक प्रदेश महामंत्री की गरिमा को भी ठेस पहुंचाती है कि उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का त्याग और सिध्दांत राष्ट्र के लिए प्रसांगिक है, जो समाचार पत्र में छपा है। निश्चित रूप से उनके यह शब्द सार्थक है लेकिन जिस महानायक का बलिदान दिवस था, उसको लेकर यह सार्थक नहीं। आमजन में यह भी चर्चा है कि अब ऐसे आयोजन औपचारिकता मात्र बनकर रह गये है। उपरोक्त प्रकरण भाजपा जिला संगठन की असंवेदनशीलता का नायाब उदाहरण है।‌ वैसे भाजपा जिलाध्यक्ष आयातित नेताओं पर ज्यादा मेहरबान है व भाजपा के प्रति निष्ठा व समर्पण भाव वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर रखा है। उसी का नतीजा है कि वर्तमान भाजपा संगठन नेताओं को पंडित दीनदयाल उपाध्याय व श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे भाजपा के महानायको में भेद ही नहीं पता। जनसंघ के संस्थापक सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर की अखंडता और धारा 370 को लेकर संघर्ष करते हुए वह बलिदान हो गये थे। शायद इनको यह भी पता न हो कि जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक हुआ करता था।

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