राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के कद्दावर नेता अशोक गहलोत का राजनीतिक जीवन ढलान पर है, यह उनके समर्थकों व आलोचकों के बीच एक बहस का विषय बना हुआ है। राज्य की राजनीति में उनकी घटती प्रत्यक्ष भूमिका, बढ़ती उम्र और विऱोधियो द्वारा किए जा रहे लगातार हमलों को उनके सियासी ग्राफ में गिरावट के तौर पर देखा जा रहा है। एक समय था जब अशोक गहलोत का कांग्रेस आलाकमान कायल था और वे कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की दौड़ में सबसे आगे थे लेकिन मुख्यमंत्री पद के मोह को गहलोत त्याग नहीं पाए और सचिन पायलट के साथ अदावत का नतीजा है कि आज उनके पास संगठन में कोई महत्वपूर्ण पद नहीं है लेकिन देखा जाए तो अशोक गहलोत ने अपने कार्यकाल में बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं लागू की थी, जो देश भर मे चर्चा का विषय रही। स्वास्थ्य सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा को लेकर उनकी योजनाओं को लेकर उन्हें नवाचार के रूप में याद किया जायेगा। इसमें संदेह नहीं कि करीब चार दशक के राजनीतिक जीवन में गहलोत केन्द्रीय मंत्री, राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष, महासचिव व मुख्यमंत्री पद की भूमिका में रहने के बावजूद व्यक्तिगत रूप से उनका राजनीतिक जीवन बेदाग रहा है। भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष भी उन पर व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप लगाने से पहले सौ बार सोचता है लेकिन यह सत्य है कि जिस राजा के सिपहसालार उच्च कोटि के व निष्पक्ष होते हैं वह राजा न्याय प्रिय होता है क्योंकि उन्हीं की इनपुट पर राजा निर्णय लेता है व इसी कारण उसका राजकीय कार्यकाल स्वर्णिम होता है। अपने मुख्यमंत्री काल में गहलोत चाटुकारों की टोली में फंस गये। चारों तरफ चाटुकारों की टोली ने अशोक गहलोत का राजनीतिक जीवन मटियामेट कर दिया। बार बार मानेसर प्रकरण का जिन्न बाहर निकाल कर गहलोत खुद कांग्रेस को ही भ्रष्ट साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि हर कांग्रेसी विधायक के साथ सरकार गिराने के लिए करोड़ों रूपये की डील हुई थी। अशोक गहलोत का व्यक्तित्व रूप से राजनीतिक जीवन बेदाग रहा हो लेकिन उनके मुख्यमंत्री काल में हुए घोटालों ने भ्रष्टाचार के नये आयाम स्थापित किए हैं। पानी जो किसी भी व्यक्ति के लिए मूलभूत सुविधाओं में से एक है लेकिन जल जीवन मिशन में हुए करोड़ों रूपये के घोटालों के आरोप में उन्हीं की सरकार के मंत्री जेल की हवा खा रहे हैं। पेपर लीक में उनकी सरकार ने रिकार्ड कायम किए हैं। आरपीएससी में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर उन पर सवाल उठे हालांकि भ्रष्टाचार के छीटे उन तक नहीं पहुंचे लेकिन उन्हीं के द्वारा मनोनीत सदस्यों ने भ्रष्टाचार का तांडव मचा दिया था। प्रशासनिक सेवाओं में कोचिंग को लेकर शत प्रतिशत चयन को लेकर नाथी का बाड़ा उन्हीं की सरकार की देन था। भले ही अशोक गहलोत को राजस्थान का गांधी और जननायक के रूप में याद करते हैं लेकिन जो भ्रष्टाचार हुआ, उसकी सरकार का मुखिया होने के नाते नैतिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते। अशोक गहलोत के शासनकाल में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के आरोप लगे। इस घोटाले में करीब 250 लोगो की गिरफ्तारी और ईडी की छापेमारी में भ्रष्टाचार और सिंडिकेट की मिलीभगत उजागर हुई, जिससे लाखों युवा प्रभावित हुए। रीट, एसआई और शिक्षक भर्ती के 15 से अधिक सरकारी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले प्रकाश में आते, जिनमें माफियाओं ने लाखों रूपये में प्रश्न पत्र बेचे। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि पेपर लीक बिना राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की मिली भगत बिना संभव नहीं था लेकिन गहलोत इसी प्रकार अपनी सरकार के मंत्रियों व अफसरों को बचाते रहे, जैसे अभी नीट परीक्षा के राष्ट्रीय स्तर पर पेपर लीक मामले में सरकार के मुखिया के तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार के मंत्री का बचाव कर रहे हैं और इस संवेदनशील मामले पर एक शब्द भी नहीं बोला है। यह भारतीय राजनीति का इतिहास रहा है कि नेता वहीं ईमानदार है, जब तक उसका भ्रष्टाचार सार्वजनिक रूप से उजागर न हो। भले ही अशोक गहलोत प्रत्यक्ष रूप से उपरोक्त भ्रष्टाचार के प्रकरणों में लिप्त न हो लेकिन सरकार के मुखिया के रूप में उन पर भी सवाल उठने लाजिमी है।
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