अमरकंटक (श्रीराम इंदौरिया): नर्मदा तट की पावन वादियों में स्थित श्री मृत्युंजय आश्रम एक बार फिर आध्यात्मिक चेतना और साहित्यिक साधना का केंद्र बन गया, जब पूज्य महामंडलेश्वर, दैवी संपद मंडल के परमाध्यक्ष, स्वामी श्री हरिहरानंद सरस्वती जी महाराज के करकमलों द्वारा अंतरराष्ट्रीय साझा काव्य संकलन ‘नमामि देवि नर्मदे’ का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ।
इस अवसर पर वातावरण भक्ति, श्रद्धा और साहित्यिक ऊर्जाओं से ओतप्रोत था। कार्यक्रम में देशभर से आए संत, साहित्यकार और हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने इस आध्यात्मिक-सांस्कृतिक क्षण को साक्षी भाव से अनुभव किया।
*साहित्य है आत्मा का प्रकाश: स्वामी हरिहरानंद सरस्वती*
अपने प्रेरक उद्बोधन में पूज्य महाराज श्री ने कहा कि ऐसे काव्य संकलन केवल शब्दों का समूह नहीं होते, बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक चेतना और दिव्य ऊर्जा के वाहक होते हैं। उन्होंने कहा—“साहित्य वह दीप है, जो मानव जीवन के अंधकार को दूर कर सन्मार्ग की ओर ले जाता है। यह नश्वर संसार भले ही परिवर्तनशील हो, किंतु साहित्यिक ग्रंथ सदैव अमर रहते हैं और युगों-युगों तक मार्गदर्शन करते हैं।” उन्होंने ‘नमामि देवि नर्मदे’ को नर्मदा मैया के प्रति समर्पित एक अद्भुत आध्यात्मिक श्रद्धांजलि बताया, जो भक्तिभाव और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
*देश-विदेश के 170 से अधिक रचनाकारों का योगदान*
संकलन के प्रधान संपादक डॉ.सुनील परीट ने ग्रंथ का परिचय देते हुए बताया कि इस काव्य संग्रह में भारत के लगभग सभी राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, मॉरीशस, बेल्जियम, इंग्लैंड और ओमान जैसे देशों के 170 से अधिक रचनाकारों की रचनाएँ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह संकलन न केवल साहित्यिक विविधता का परिचायक है, बल्कि नर्मदा मैया के प्रति वैश्विक आस्था और श्रद्धा का जीवंत प्रमाण भी है।
संकलन के सह-संपादक मॉरीशस के डॉ.सोमदत्त काशीनाथ ने भी इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके लिए उन्हें विशेष रूप से सराहा गया।
*भक्ति, साहित्य और संस्कृति का संगम*
कार्यक्रम में भागवत कथाकार राममूर्ति मिश्र, यजमान राजेंद्र अग्रवाल सहित अनेक संत-महात्मा एवं विद्वान साहित्यकार उपस्थित रहे। आयोजन के दौरान नर्मदा स्तुति, भजन और आध्यात्मिक प्रवचनों ने पूरे वातावरण को दिव्यता से भर दिया।
*नर्मदा — केवल नदी नहीं, जीवनधारा*
इस अवसर पर वक्ताओं ने नर्मदा मैया को भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा बताते हुए कहा कि यह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि श्रद्धा, तप और मोक्ष की प्रतीक है। ‘नमामि देवि नर्मदे’ जैसे संकलन उस दिव्य चेतना को शब्दों में ढालने का एक सफल प्रयास हैं। यह लोकार्पण समारोह न केवल एक पुस्तक विमोचन तक सीमित रहा, बल्कि यह एक ऐसा आध्यात्मिक उत्सव बन गया, जिसने साहित्य, संस्कृति और भक्ति को एक सूत्र में पिरोकर मानव जीवन के उच्चतम मूल्यों की पुनर्स्मृति कराई।