आदि है आदि अनादि मेरा, संसार सागर भक्ति भेरा। आदि है अन्त है अन्त है आदि है, विड़द तेरा॥ काल है झाल है, झाल है काल है, राखिले राखिले प्राण घेरा। जीव का जन्म का जन्म का जीव का, आप ही आप ले भांनि झेरा॥ भर्म का कर्म का कर्म का भर्मका, आइबा जाइबा मेटि फेरा। तारिले पारिले पारिले तारिले, जीव सौं सीव है निकट नेरा॥ आत्मा राम है राम है आत्मा, ज्योति है जुगति सौं करौ मेला। तेज है सेज है सेज है तेज है, एक रस दादू खेल खेला॥ जिसका आदि नहीं होता वह अनादि कहलाता है। बह्म अनादि है, क्योंकि उसका कोई कारण नहीं। श्रुति में यह ही कहा है कि न उसका कोई कार्य है और न उसका कोई कारण है। वहां जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है अत: वह आदि कहलाता है क्योंकि "यतो वा इमानिभूता जायन्ते" इति श्रुति से ब्रह्म जगत् का कारण सिद्ध होता है। यद्यपि ब्रह्म आदि, अन्त, मध्य से रहित है, ऐसा श्रुति कहती है फिर भी सृष्टि के आदि में वह ब्रह्म ही था। सदेव सोध्येदभिदमग्न आसीत्, इस श्रुति से उसको आदि कहते है। सबका अधिष्ठान होने से सबके अन्त में भी वह ही शेष रहता है, अत: वह अन्त भी कहलाता है। संसार के आरम्भ से प्रलय-पर्यन्त वेद और शास्त्रों में उसीका गुण गाया जाता है। भगवान् काल का भी काल है, वह महाकाल भगवान् मुझे कालजन्य कारों से बचावे। कर्म करके कर्मफल भोगने के कारण जीव कर्म का कर्ता और फल का भोक्ता कहलाता है। अत: मेरा कर्तृत्व भोक्तृत्व रूप संसार और बार-बार संसार में आवागमन इन सबको ज्ञान के द्वारा मिटा दो। यह जीव आपका ही अंश है, अत: अपने अश को अंशी में मिला दो। काम क्रोधादि दोषो को मिटाकर तज्जन्य वेग से मेरी रक्षा करो, दैवी गुणों से भी परे जो निर्गुण स्थिति है उसमें मुझे पहुंचा दो। राम ही आत्मा है और आत्मा ही राम है, ऐसी अभेद बोधक युक्तियों से मेरे हृदय में जीव ईश्वर का अभेद ज्ञान पैदा कर दो। ब्रह्म ही तेज है और उसकी जो ब्रह्माकारावृत्ति है वह भी बहारूप ही है क्योंकि वृत्ति में ब्रह्म प्रविष्ट है। ऐसी अभेद बोधक युक्तियों से मेरे मन से अभेद ज्ञान को पैदा करें। ब्रह्माकार वृत्ति से सदा ब्रह्मानन्द रस का पान रूपी क्रीडा करता रहूं। ऐसी कृपा आप मेरे ऊपर कीजिये। योगवासिष्ठ में कहा है कि- हे राम ! जिससे यह सारा संसार उत्पन्न होता है, जिसमें संपूर्ण जगत् स्थिर रहता है, जो संपूर्ण जगद्रुप है, जो सब ओर विद्यमान है और जो सर्वमय है, उसीको नित्य परमात्मा समझो।
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