ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अन्तर नहिं कीजै। जैसैं आतम आपा लेखै, जीव जन्तु ऐसे कर पेखै॥ एक राम ऐसे कर जानैं, आपा पर अन्तर नहिं आने॥ सब घट आतम एक बिचारै, राम सनेही प्राण हमारै॥ दादू सांची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई॥ राम का भक्त राम का चिन्तन करता हुआ सब जगह पर राम को ही देखता है। अविद्या और उसके कार्य की निवृत्ति हो जाने से सर्वत्र उसका सुखरूप ब्रह्म ही भासता है। सब भूतों में भोक्ता के रूप में स्थित एक व्यापक आत्मा को ही देखता है। सब प्राणियों को अपनी तरह से देखता है। अर्थात् जैसे मुझे सुख अभीष्ट और दुःख अनिष्ट है। उसी प्रकार सभी प्राणियों को भी सुख-दुःख, प्रतिकूल-अनुकूल, इष्ट, अनिष्ट रूप से दिखते हैं। आत्मा की समता होने के कारण सबको समान ही देखता है। सब प्राणियों में एक राम को देखता हुआ न द्वेष, न निन्दा करता किन्तु सबके साथ समान ही व्यवहार करता है। ऐसा सर्वात्मैकदर्शी सम्यक्दी योगी कहलाता है। इस प्रकार राम को जानने वाला मुझे प्रिय है। गीता में कहा है कि-सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थित रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है। हे अर्जुन ! जो योगी अपनी ही तरह संपूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख-दुःख को भी सम ही देखता है वह योगी श्रेष्ठ माना जाता है।
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