हारीज में पहली बार ‘बारह व्रत’ स्वीकार की ऐतिहासिक क्रिया संपन्न, दीक्षा महोत्सव का आगाज

AYUSH ANTIMA
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रानीवाड़ा/जालौर (मदन माहेश्वरी): 500 श्रमणी गणनायक जैनाचार्य रश्मिरत्नसूरीजी की निश्रा में हारीज के इतिहास में पहली बार ‘बारह व्रत’ स्वीकार करने तथा ‘भवोभव पुद्गल वोसिराने’ की क्रिया का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस धार्मिक आयोजन को लेकर जैन संघ में विशेष उत्साह का माहौल रहा। 3 मई को आयोजित इस कार्यक्रम में 451 दीक्षादानेश्वरी आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी के आजीवन चरणोपासक जैनाचार्य रश्मिरत्नसूरीजी तीन माह पश्चात राजस्थान में विभिन्न प्रतिष्ठा एवं दीक्षा कार्यक्रम पूर्ण कर पुनः हारीज जैन संघ में पधारे। उनके आगमन से पूरे संघ में हर्षोल्लास छा गया। इससे पूर्व यहां पहली बार शास्त्रीय सामायिक का आयोजन भी किया गया था। रविवार को नूतन उपाश्रय में ‘चतुर्मुखी वीतराग’ की स्थापना कर परमात्मा, गुरु एवं सकल संघ की साक्षी में मंगल विधि संपन्न हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बारह व्रत धारण कर श्रावक-श्राविका बनने का लाभ प्राप्त किया। जैनाचार्य ने अपने प्रवचन में कहा कि “व्रतधारी नरक में नहीं जाते, इसलिए नरक के द्वार बंद करने के लिए यह क्रिया आवश्यक है।” इसी क्रम में सोमवार से बुधवार तक विश्वविख्यात जैन तीर्थ शंखेश्वर महातीर्थ के 108 भक्तिविहार में युवा मुमुक्षु अक्ष जैन कवाड़ (मारवाड़ी) का त्रिदिवसीय भव्य दीक्षा महोत्सव आयोजित किया जाएगा। 24 वर्षीय मुमुक्षु अक्ष का मूल निवास राजस्थान के पादरू गांव का है, जबकि उनका परिवार वर्तमान में साबरमती में निवास करता है।

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