गौवंश को लेकर बहुत बड़ी बड़ी बाते जिले के उन गौशालाओं व नंदी शालाओं के संचालकों के मुखारविंद से सुनने को हमें मिलती है। उनकी बातों में इतना मिठास होने के साथ ही स्वार्थ का तड़का भी लगा हुआ होता है। उन गौशालाओं को जिले के भामाशाहों द्वारा उदारमना से आर्थिक सहयोग देते रहते हैं लेकिन उन्होंने कभी भी खुद को महिमा मंडित नहीं किया क्योंकि उनके दिलों में हमारे लिए अपार श्रद्धा व विश्वास है और उनकी हमेशा यह धारणा रही है कि हमारे जैसे असहाय व लाचार गौवंश लठ्ठ खाता न घूमें व इसके साथ ही बूचड़खानों में न जाने पाए। हमें बड़ा ताज्जुब होता है कि हमें असहाय और लावारिस छोड़ दिया जाता है लेकिन उससे बड़ा ताज्जुब तब होता है, जब भामाशाहों व सरकारी अनुदान से चलने वाले वृध्दाश्रम, जिनको आम भाषा मे गौशाला कहा जाता है, उनके संचालक यह कहकर लेने से मना कर देते हैं कि यह बूढ़ी होने के साथ ही हमें दुधारू चाहिए। मानव जाति में भी असहाय व लाचार स्त्री-पुरूष को जब वृध्दाश्रम में छोड़ने के लिए कोई जाता है तो क्या उसके संचालक भी यही प्रश्न करते हैं कि हमें कमाऊ पुरूष या स्त्री चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो फिर इन गौशालाओं के संचालन करने वाले हमें आसरा देने से मना आखिर क्यों कर देते हैं। यह ज्वलंत प्रश्न उन उदारमना दानदाताओं व भामाशाहों और सरकार से है कि जब आर्थिक सहयोग आप महानुभावों द्वारा दिया जाता है तो इनकी आखिर चौधराहट क्यों है। क्या कभी आपकी आंखों के सामने वह दर्दनाक दृश्य नहीं आया, जब भरे बाजार में हमारी पीठ पर लठ्ठों की बौछार होने के साथ ही हम कूड़ा करकट खाने को मजबूर हैं। जब गौशालाओं में एक गाय को एक केला और लड्डू खिलाते देखती हूं तो मेरे मुंह में भी पानी आ जाता है परन्तु उसके बाद इस बात को लेकर संतोष भी होता है कि एक केला या लड्डू तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। मेरा भी उन भामाशाहों व गौशाला संचालकों से निवेदन है कि मेरी तरफ भी थोड़ी निगह रखें आखिर मैं भी वहीं गौवंश हूं।
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