बीकानेर: बीकानेर प्रशासनिक शुचिता, पारदर्शिता और जनता के विश्वास को तार-तार करने वाला एक ऐसा कड़ा और रोंगटे खड़े कर देने वाला महा-फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने बीकानेर के पूरे सरकारी तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के आदेशों को ठेंगे पर रखना, जिला कलेक्टर को गुमराह करना और खुद पूर्व जिला कलेक्टर के अपने हाथों से हस्ताक्षरित आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक देना—यह बीकानेर के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अमले का नया 'शगल' बन चुका है। इस पूरे काले साम्राज्य और कागजी जालसाजी का पर्दाफाश सहायक लैब तकनीशियन किशन गोपाल छंगाणी द्वारा पेश किए गए अकाट्य साक्ष्यों, आरटीआई दस्तावेजों और जिला कलेक्टर को सौंपे गए कड़े शिकायती पत्र से हुआ है।
*खुद के हस्ताक्षर से पलटा प्रशासन, जनसुनवाई या 'जन-उत्पीडऩ*
इस पूरे मामले का सबसे घिनौना और हैरान करने वाला मोड़ तब सामने आया जब जिला प्रशासन की साख पर सीधे सवालिया निशान लग गया।
*कलेक्टर के आदेशों की सरेआम धज्जियां*
पूर्व जिला कलेक्टर ने स्वयं अपने पत्रांक: सीबी / सतर्कता/पीजी 98/25/513 दिनांक 30.03.26 पर अपने हस्ताक्षर करके जिस फाइल को जांच के लिए आगे बढ़ाया था, उसे नीचे बैठे भ्रष्ट तंत्र ने दबा दिया।
*रसीद नंबर 21 का धोखा*
बताया जा रहा है कि 14 अप्रेल की जनसुनवाई में पीडित परिवादी को रसीद क्रमांक 21 थमाकर व्यवस्था ने औपचारिकता तो पूरी कर ली, लेकिन जब परिवादी ने प्रगति पूछी, तो मुंह पर कह दिया गया कि जिला कलेक्टर इस प्रकरण को सतर्कता समिति में दर्ज ही नहीं करना चाहते। पीडित का आरोप है कि यदि मामला दर्ज ही नहीं करना था तो जनसुनवाई की रसीद काटकर पीडित के जख्मों पर नमक क्यों छिड़का गया। क्या जनसुनवाई केवल सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी और जनता को टरकाने का अड्डा बन चुकी है।
*बिना रेफरेंस नंबर नियुक्ति और सीएमएचओ की 'लुका-छिपी'*
मामले की जड़ें साल 2019 में अनुबंधित प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए हुई अवैध नियुक्तियों से जुड़ी हैं, जिसे बीकानेर के एक अखबार ने भी प्रमुखता से उजागर किया है। जिसमें नियमों को ताक पर रखकर बिना किसी वैध 'रेफरेंस नंबर' के धड़ल्ले से नियुक्ति पत्र बांटे गए और अनुभव प्रमाण पत्रों पर सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर तक गायब हैं। नियम कहते हैं कि किसी भी संविदाकर्मी के लिए वैध एग्रीमेंट और 'सर्विस ब्रेक' होना अनिवार्य है लेकिन यहाँ बिना किसी एग्रीमेंट और बिना किसी ब्रेक के एक कर्मचारी को संविदाकर्मी मानकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है। आरटीआई के प्रमाणित दस्तावेजों के विपरीत जाकर 08 अप्रेल 2026 को एक मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार की गई, ताकि विभाग अपनी पुरानी गलतियों को छिपा सके।
*फाइल दबाने की दलाली*
कलेक्टर कार्यालय द्वारा मांगे गए जवाब को सीएमएचओ बीकानेर ने 04 महीने 26 दिन तक दबाए रखा। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक पकड़ को खुली और रसूखदार चुनौती है। अब सवाल उठता है कि क्या भारतीय कानून में आरटीआई और ई-मेल की औकात खत्म हो चुकी है। इस पूरे प्रकरण ने देश की सबसे मजबूत पारदर्शी व्यवस्थाओं पर एक खौफनाक प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बीकानेर के इन भ्रष्ट अधिकारियों के आगे देश का कानून, आधिकारिक सरकारी ई-मेल और सूचना का अधिकार जैसे अकाट्य संवैधानिक हथियारों की महत्ता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। सरकारी ई-मेल और आरटीआई के पन्ने चीख-चीखकर विभाग में चल रहे फर्जीवाड़े की गवाही दे रहे हैं, लेकिन सतर्कता शाखा के अधिकारी निष्पक्ष जांच करने के बजाय भ्रष्टाचारियों के लिए 'बचाव पक्ष' के वकील की तरह आंखें मूंदकर काम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के पास भेजी जाने वाली रिपोर्ट में गलत तथ्य भेजकर ये अधिकारी सीधे तौर पर जिला प्रशासन की छवि को धूमिल कर रहे हैं।
*परिवादी कर रहा है कार्रवाई का इंतजार*
इस महा-फर्जीवाड़े और तानाशाही के खिलाफ अब बीकानेर से लेकर जयपुर निदेशालय और न्यायालय तक 'आर-पार' की जंग छिड़ चुकी है। पीडित ने जिला कलेक्टर से दो टूक शब्दों में मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की पत्रावली को सतर्कता शाखा से तुरंत वापस मंगवाकर, जिला कलेक्टर स्वयं अपने स्तर पर असली प्रमाणित दस्तावेजों से इसका मिलान करें। कलेक्टर को गुमराह करने वाले सीएमएचओ कार्यालय के संबंधित अधिकारियों और दागी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी ऐसी धृष्टता न कर सके।