सत्ता क्या सुख प्राप्ति या ताकत का प्रदर्शन है

AYUSH ANTIMA
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चाणक्य नीति के अनुसार सत्ता केवल सुख भोगना या अपनी ताकत का प्रदर्शन करना बिल्कुल भी नहीं है। चाणक्य का मानना था कि राजा या शासक का सबसे पहला कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना और उसका कल्याण करना है। एक आदर्श शासक वहीं होता है, जो प्रजा की खुशी में ही अपनी खुशी समझे। सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि अनुशासन और कठोर दिनचर्या पालन के लिए है। चाणक्य के अनुसार एक अच्छे शासक को व्यक्तिगत सुखों को त्याग करके न्यायपूर्ण तरीके से शासन चलाना चाहिए। ताकत या सत्ता का इस्तेमाल कमजोर लोगों को डराने के लिए नहीं बल्कि अपराधियों को दंडित करने और समाज में धर्म और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए। सत्ता को लेकर चाणक्य का एक प्रसिद्ध श्लोक प्रजासुखे सुखं राज्ञ: प्रजाना च हिते हितम नात्म प्रिय हितं राज्ञ: प्रजाना तु प्रिय हितम।। अर्थात शासक को अपनी प्रजा की खुशी में ही अपनी खुशी देखनी चाहिए और प्रजा के हित मे ही अपना हित समझना चाहिए। जो शासक अपने सुख के लिए सत्ता का उपयोग करता है, उसका विनाश निश्चित है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता जनता द्वारा सौंपी गई एक अस्थाई जिम्मेदारी है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता किसी की बपौती नहीं बल्कि अंको का खेल है। इसलिए सत्ता का उपयोग जनहित और विकास के कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। यदि सत्ता का उपयोग केवल सुख भोगने और शक्ति प्रदर्शन के लिए किया जाता है तो यह निरंकुश (तानाशाही) का रूप ले लेती है। चाणक्य व महात्मा गांधी जैसे विचारकों ने हमेशा रामराज्य और राजनीति में नैतिकता का समर्थन किया था, जहां सत्ता का केन्द्र बिन्दु हमेशा जनता का कल्याण है लेकिन दुर्भाग्य कि आधुनिक चाणक्य के सिपहसालारों ने सत्ता की परिभाषा ही बदल दी। सूत्रों के अनुसार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाभियान में भाजपा के कार्यकर्ताओ को संबोधित करते हुए कहा कि जो सत्ता में रहेगा, वहीं सुखी रहेगा, बाहर रहे तो खून जलाते फिरोगे। उन्होंने सत्ता को सुख और ताकत का माध्यम बताया। उनका यह बयान सत्ता के घंमड की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा कि सत्ता पर हमेशा भाजपा ही काबिज रहेगी। आज जो नेता सत्ता सुख व ताकत की बात करते हैं, उनको भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह स्वर्गीय अटल जी के उस भाषण को देखना चाहिए, जो उन्होंने लोकसभा में दिया था। उन्होंने सत्ता को लेकर नैतिकता होने को लेकर कहा था कि पार्टी को छोड़कर नया गठबंधन करके, सत्ता हाथ में आती है तो मैं उस सत्ता को चिमटे से छूना भी पसंद नहीं करूगा।

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