क्या इस देश में ईमानदारी ही सबसे बड़ी अयोग्यता बन चुकी है। यह सवाल आज भारत के करोड़ों युवाओं के सीने में सुलग रहा है। एक तरफ हम दुनिया के मंच पर खड़े होकर दुश्मन देशों को नेस्तनाबूद करने और सर्जिकल स्ट्राइक की बातें करते हैं। दूसरी तरफ अपने ही देश में चंद नकल माफियाओं और सॉल्वर गैंग के आगे घुटने टेक कर असहाय खड़े नजर आते है। हर साल नीट जैसी देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील परीक्षा का विवादों में घिरना और रद्द होना सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक नाकामी है। जब सरकार अंतरिक्ष में रॉकेट भेज सकती है तो वह एक प्रश्न पत्र को तिजोरी में सुरक्षित क्यों नहीं रख पाती। असल में कमी काबिलियत की नहीं, बल्कि इस भ्रष्ट सिस्टम को उखाड़ फेंकने वाली 'नीयत' की है। राजस्थान से लेकर देश के विभिन्न राज्यों तक, सरकारी भर्ती परीक्षाओं और इंटरव्यू की साख आज अपने सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। युवाओं के बीच यह धारणा पत्थर की लकीर बन चुकी है कि केवल पढ़ाई और मेहनत के दम पर नौकरी पाना अब नामुमकिन है। परीक्षा की शुरुआत से लेकर इंटरव्यू के आखिरी दौर तक, हर जगह बस भ्रष्टाचार का सन्नाटा है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि जो बच्चे सालों-साल अपनी जवानी किताबों के हवाले कर देते हैं, वे अंत में कतार से बाहर कर दिए जाते हैं। दूसरी तरफ, जिनके पास पैसा, ऊंची पहुंच और सेटिंग है, वे बड़ी आसानी से इस सिस्टम के सिरमौर बन जाते हैं। बार-बार होने वाले पेपर लीक, डमी कैंडिडेट और सॉल्वर गैंग ने युवाओं का भरोसा पूरी तरह तोड़ दिया है। राजस्थान की रीट परीक्षा हो या सब-इंस्पेक्टर भर्ती का विवाद, हर जगह एक जैसी ही घिनौनी कहानी है। मेहनत करने वाला गरीब या मध्यम वर्ग का छात्र परीक्षा हॉल में बैठकर पसीना बहाता है। दूसरी तरफ कुछ रसूखदार लोग परीक्षा शुरू होने से पहले ही पेपर खरीदकर देश के भविष्य का सौदा कर लेते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में युवाओं के साथ इससे बड़ा अन्याय नहीं हो सकता। सरकार ने इस धांधली को रोकने के लिए भारी-भरकम जुर्माने वाला नया कानून तो बना दिया लेकिन इसके बाद भी पेपर का बिकना बंद नहीं हुआ है। कानून की धज्जियां उड़ाते हुए माफिया आज भी बेखौफ घूम रहे हैं। यही हाल इंटरव्यू की व्यवस्था का भी है। लिखित परीक्षा में टॉप करने वाले मेधावी छात्रों को इंटरव्यू के बंद कमरों में रहस्यमयी ढंग से न्यूनतम नंबर देकर बाहर कर दिया जाता है। इसके विपरीत मंत्रियों-अफसरों के चहेतों को बिना किसी काबिलियत के असामान्य रूप से अधिकतम नंबर सौंप दिए जाते हैं। सीधी सी बात है कि जहां बंद कमरों में फैसले होंगे और पारदर्शिता शून्य होगी, वहां भाई-भतीजावाद और करप्शन शत-प्रतिशत होगा। यही वजह है कि अब उच्च पदों को छोड़कर बाकी सभी सरकारी नौकरियों से इंटरव्यू को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने की मांग उठ रही है ताकि किसी भी अफसर या नेता को मनमानी करने का हक ही न मिले। यह संकट सिर्फ बेरोजगारी का नहीं, बल्कि हमारे पूरे समाज के नैतिक पतन का संकेत है। आज की व्यवस्था ईमानदार युवाओं को सिर्फ एक ही आत्मघाती संदेश दे रही है कि इस देश के सिस्टम में सबसे कमजोर और बेबस वही है, जो ईमानदार है।
इस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था को रोकने के लिए अब केवल कागजी दावों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए तुरंत कुछ क्रांतिकारी और कड़े कदम उठाने होंगे। सबसे पहले परीक्षा कराने वाले चयन बोर्ड और लोक सेवा आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों की राजनीतिक नियुक्तियां तुरंत बंद करनी होंगी। इन पदों पर केवल बेदाग छवि वाले रिटायर्ड जजों या बेहद ईमानदार प्रशासनिक अधिकारियों को ही बैठाना होगा। इसके साथ ही, पेपर छपने से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया में इंसानी दखल को पूरी तरह खत्म करके सुरक्षित डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। जिन संदिग्ध प्राइवेट स्कूलों को सेंटर बनाकर यह पूरा खेल खेला जाता है, उन्हें हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए। सभी प्रतियोगी परीक्षाएं केवल और केवल सरकारी शिक्षण संस्थानों में सीसीटीवी की सख्त निगरानी में आयोजित की जाएं। जवाबदेही तय करने के लिए नियम इतने सख्त होने चाहिए कि जिस भी अधिकारी की देखरेख में पेपर लीक हो, उसे तुरंत नौकरी से बर्खास्त करके उसकी संपत्ति जब्त हो। पेपर माफियाओं के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर उन्हें चंद महीनों के भीतर ऐसी सख्त सजा दी जाए जो मिसाल बने, साथ ही इंटरव्यू की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करके अंकों की एक अधिकतम सीमा तय की जाए ताकि भेदभाव की कोई गुंजाइश ही न बचे। जब तक इच्छाशक्ति दिखाकर इन सुधारों को जमीन पर नहीं उतारा जाएगा, तब तक युवाओं का यह आक्रोश शांत नहीं होगा। व्यवस्था को यह समझ लेना चाहिए कि देश के युवाओं के सब्र का बांध अब टूट चुका है और यह आक्रोश किसी दिन बड़े जन-विद्रोह में बदल सकता है।
*महेश झालानी*
वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर