दादू होणा था सो ह्वै रह्या, जे कुछ किया पीव। पल बधै न छिन घटे, ऐसी जाणी जीव।।४६ ।।* संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि विधाता ने जो भाग्य में लिख दिया है, वही जीव भोगता है। न थोड़ा भी घटता और बढ़ता है। ऐसा ही शास्त्रों का निश्चय है।
महाभारत में आसन, शयन, यान, उत्थान,पतन, भोजन, यह सब प्राणियों का नियत है और समय पर ही मिलता है। वैद्य भी रोगी होते हैं। बलवान् भी दुर्बल देखे जाते हैं। धनवान् भी नपुंसक होते हैं। क्योंकि यह काल बड़ा विचित्र है। अच्छे कुल में जन्मना, पराक्रम, आरोग्य, सुन्दर रूप, सौभाग्य और वस्तुओं का उपभोग, भाग्य से ही मिलते हैं। न चाहने पर भी दरिद्रों को बहुत पुत्र हो जाते हैं, धनवानों के चाहने पर भी नहीं होते,क्योंकि भाग्य बड़ा विलक्षण होता है। व्याधि होना, अग्नि में जल जाना, जल में डूब कर मर जाना, शस्त्रों के घावों से मरनाभूखे मरना, जहर खाकर मरना, ज्वर से मृत्यु से मरना, उत्थान और पतन, ये जिसके भाग्य में जैसा लिखा है वह वैसा ही पाता है; इसलिए जब भाग्य के अनुसार ही सब कुछ होता है तो ऐसा जानकर भगवान् का ही भजन करना चाहिये।