खबर का असर: मायड़ भाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला

AYUSH ANTIMA
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सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राजस्थान सरकार को राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ाने का निर्देश दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ व संदीप मेहता की बैंच ने शिक्षा में मातृभाषा को प्राथमिकता देने के लिए 30 सितम्बर 2026 तक नीति बनाने और अनुपालना रिपोर्ट पेश करने को कहा है। माननीय कोर्ट ने इस मामले में जल्द ही एक नीति या समिति गठन करने के भी निर्देश दिए हैं। यह निर्णय पद्म मेहता और अन्य द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें कहा गया कि चार करोड़ से अधिक लोगों की भाषा होने के बावजूद इसे उचित स्थान नहीं मिला। इस निर्देश का उद्देश्य स्कूल स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा का अवसर प्रदान करना है। यह फैसला राजस्थान की क्षेत्रीय संस्कृति और भाषाई अधिकारो को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस सुप्रीम फैसले ने मायड़ भाषा प्रेमियों को उत्साह व ऊर्जा से भर दिया है। इस फैसले ने राजस्थानी भाषा को कानूनी समर्थन और संवैधानिक मान्यता का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इस फैसले से राजस्थानी भाषा का प्रचार प्रसार ही नहीं होगा बल्कि राजस्थान की गौरवशाली विरासत, कला, संस्कृति, संगीत और साहित्य की वैश्विक पटल पर स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। राजस्थानी भाषा को राजभाषा का दर्जा देने को लेकर आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) ने अखबार के 9 अप्रेल के विशेषांक में अपने लेख में इस भाषा को संवैधानिक दर्जा देने, राजभाषा बनाने व संविधान की आठवीं सूची मे शामिल करने की पुरजोर मांग की थी। अब कोर्ट के आदेश से करोड़ों राजस्थानियों की मायड़ भाषा को राजभाषा का दर्जा मिलने की प्रबल संभावना नजर आने लगी है। कोई भी मातृभाषा किसी प्रदेश या क्षेत्र की संस्कृति और अस्मिता की संवाहक होती है। इसके बिना मौलिक विचार संभव नहीं है। विदित हो संविधान की मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में राजस्थानी भाषा 17 भाषाओं से बड़ी है। हालांकि 2003 में राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर वह प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेज चुकी है। इस भाषा को राजभाषा घोषित करने को लेकर वर्षों से आंदोलन चल रहे हैं लेकिन केन्द्र सरकार ने तत्कालीन राजस्थान सरकार के उस प्रस्ताव पर सकारात्मक पहल नहीं दिखाई। राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय कन्हैया लाल सेठिया जी ने एक दोहे से राजस्थानी भाषा के महत्व को समझाने की कोशिश की है ...
खाली धड़ री कद हुवै, चेहरे बिना पिछाण। राजस्थानी रै बिना, क्यारो राजस्थान।।
राजस्थानी भाषा राजस्थान का चेहरा यानी गौरव है, इसके बिना राजस्थान की पहचान असंभव है।‌ इस फैसले को लेकर भजन लाल शर्मा के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार को राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने व संवैधानिक दर्जा दिलवाने को लेकर केन्द्र सरकार पर दबाव बनाकर राजस्थानियों के गौरव हासिल करने में सहायक होना चाहिए।

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