धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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हुसियार हाकिम न्याव है साई के दीवान। कुलि का हिसाब होगा, समझि मुसलमान॥ नीयत नेकी सालिकां रास्तां ईमान। इखलास अन्दरि आपणे रखणां सुबहान॥ हुक्म हाजिर होइ बाबा मुसल्लम महरबान। अक्ल सेती आपणा शोधि लेहु सुजान।। हक सौं हूजरी हूंणा, देखणां करि ज्ञान। दोस्त दानां दीन का, मानणां फुरमान।। गुस्सा हैवानी दूर कर, छाड़ दे अभिमान। दुई दरोगां नाहिं खुशियां, दादू लेहु पिछाण।। न्याय करने वाले हाकिम ! सावधान रहना। भगवान् के द्वार पर तेरा भी हिसाब होगा। हे यवन, क्योंकि भगवान् के यहां सभी का फैसला होता है, अत: तेरा भी होगा। अत: सबका भला करना। धर्म ही तेरे साथ यात्रा में चलेगा। सबसे प्रेम करना। परमात्मा की पवित्र आज्ञा का पालन करना। दयालु रहना। हे बुद्धिमन् ! अपनी बुद्धि से यथार्थ मार्ग को खोज कर प्रभु भक्ति से परमात्मा को पहचान कर ज्ञान के द्वारा उसको प्राप्त करना। सबके मित्र परमात्मा तथा सन्तों की आज्ञा का पालन करना। पाशविक बुद्धि और क्रोध को छोड़ दे। अभिमान मत कर। भेदबुद्धि से जो तेरा मन प्रसन्न होता है, वह प्रसन्नता तेरी मिथ्या है। ऐसा जानकर उस बुद्धि को त्याग दे। यह सब तेरा कर्तव्य है। ऐसा मानकर इन सब बातों का पालन करना। इस पद्य के द्वारा सांभर नगर में विलन्द खान हाकिम को उपदेश दिया था जो इस उपदेश से प्रभावित होकर भक्त बन गया था।

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