देश के युवा वर्ग को पथ भ्रष्ट करती सोशल मीडिया पर परोसी जा रही अश्लीलता

AYUSH ANTIMA
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विद्वानो व प्रबुद्धजनों का मत रहा है कि किसी व्यक्ति के पारिवारिक सुकून को खत्म करना है तो उसकी औलाद को बिगाड़ दो और अगर किसी देश को बर्बाद करना हो तो उसकी संस्कृति व सभ्यता को नष्ट कर दो। एक समय था कि जब घर की बहू बेटियों के नाचने गाने को लेकर बहुत बुरा माना जाता था। नाचने गाने का काम केवल भांडो के जिम्मे ही था। आधुनिकता की अंधी दौड़ ने शास्त्रीय संगीत व नृत्य कला के दौर को खत्म कर दिया है और नाचने गाने के नाम पर अश्लीलता और भौंडेपन का खुलेआम प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर जिस तरह से यूट्यूब व टिकटाक जैसे प्लेटफार्म का इस्तेमाल बेहूदगी व अश्लीलता परोसने को लेकर हो रहा है, यह हमारे सभ्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों के पतन के साथ साथ भयावह स्थिति है।‌ भले घर की सभ्य युवतियां और महिलाएं इन प्लेटफार्म पर खुलेआम अश्लीलता व भौंडापन व फूहड़ता परोस रही है। यह किसी भी रूप मे हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत व सभ्यता के लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आधुनिकता के नाम पर नग्नता व अश्लीलता का परोसा जाना किसी भी दृष्टि से जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यह हमारे देश की विडंबना है कि माता सीता को आदर्श मानने वाली यह भारत भूमि अपने नैतिक मूल्यों से पथ भ्रष्ट हो गई है। टीवी चैनलो पर फूहड़ता भरे दृश्य, खून में डूबे हुए दृश्य, अश्लीलता, महिलाओ के साथ छेड़छाड़ वाले दृश्य दिखाना आम बात हो गई है। सवाल यह है कि इन अपराधिक घटनाओं को मूल रूप से दिखाना जरुरी है। इसका युवा पीढ़ी व कोमल मन मस्तिष्क वाले बच्चों पर क्या असर होगा लेकिन टीवी चैनल अपनी रेटिंग बढ़ाने व कमाई को लेकर ही चितिंत नजर आते है। टीवी चैनलो व सोशल मीडिया पर परोसी जाने वाली वाहियात बातो को लेकर सूचना व प्रसारण मंत्रालय को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इन बातों का ही परिणाम है कि हमारे देश का युवा वर्ग अपराधों की दुनिया की तरफ चल पड़ा है। इसी का परिणाम यह भी देखने को मिल रहा है कि युवा वर्ग का रूझान अश्लील साहित्य की तरफ हो गया है। इस गंदगी की सफाई को लेकर समाज के जागरूक लोगों को भी आगे आना होगा। इस बात को लेकर सरकार को भी गंभीर प्रयास करने होंगे, जिससे आने वाली नस्लों पर इनके कारण पड़ रहे बुरे प्रभावों से बचाया जा सके। हमारे देश के सनातनी, सांस्कृतिक व सभ्यता से भरे मूल्यों को बचाने में साहित्य भी अपनी अहम भूमिका अदा कर सकता है। सरस्वती पुत्रो को भी इस दिशा में अपने उच्च कोटि के विचारों से युक्त इसके खिलाफ लिखने के प्रयास करने होंगे ।

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