आखिर सरकार क्यों है बीटीयू के अनुबंधित शिक्षकों पर मेहरबान

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर: राज्य सरकार की कथनी और करनी में कितना फर्क होता है। इस बात का अंदाजा तो इससे ही लगाया जा सकता है कि किसी मामले की जानकारी ओर तथ्य होने के बाद भी उस पर ठोस कार्रवाई न करें। कुछ ऐसा ही बीकानेर तकनीकी विवि प्रकरण में किया जा रहा है, जहां अनुबंधित शिक्षकों को स्थाई बताकर उन्हें हर महीने लाखों का वेतन दिया जा रहा है, जबकि उनका अनुबंध खत्म हुए 17 वर्ष होने को है। इसको लेकर स्थानीय स्तर से प्रदेश के मुखिया तक व कुलाधिपति तक शिकायत पहुंच चुकी है। मामले की पड़ताल भी हुई, जिसमें भी खामियां सामने आई किन्तु सभी नियमों और हाईकोर्ट के नोटिस को हवा कर विवि प्रशासन निडर होकर अपात्रों को पदौन्नति लाभ दे रहा है जबकि अन्य कार्मिकों को पीएफ तक नहीं मिल रहा है। उन्हेें अपने वेतन के लिये भी दो-दो हाथ करने पड़ते है। बताया जा रहा है कि अभियांत्रिकी महाविद्यालय में 2009 तक अनुबंधित शिक्षकों को आज भी सभी प्रकार के वेतन, भत्ते और परिलाभ दिए जा रहे है, जबकि उनका अनुबंध समाप्त हुए करीब 17 वर्ष हो चुके है। इसके उपरांत भी इन शिक्षकों को हटाने की बजाय महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी दे रखी है। इतना ही नहीं इन अनुबंधात्मक शिक्षकों द्वारा महाविद्यालय से एमटेक और पीएचडी में उच्च अध्ययन में जाने के लिये नियुक्ति को नियमित बताकर सवैतनिक उच्च अध्ययन पर जाकर उपाधियां अर्जित की है और महाविद्यालय से इस अवधि का पूरा वेतन उठाया है, जबकि कुछ जने तो इसकी पात्रता तक नहीं रखते। ईसीबी में भ्रष्टाचार के हालात इस कदर है कि अनुबंध शिक्षकों को वित्त नियंत्रक और कुलसचिव ने नियम विरूद्व जाकर 21वीं प्रबंध मंडल की बैठक में प्रमोशन लाभ के आदेश तक जारी कर दिए, जिसके चलते करोड़ों रूपये का घालमेल व राजस्व का नुकसान सरकार को हुआ है। उसके उपरान्त भी सरकार आंखे मूंदे बैठी है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार बीटीयू के अनुबंधित शिक्षकों पर इतना मेहरबान क्यों है। चर्चा ये है कि इनमें अधिकांश अनुबंधित शिक्षक वे है, जो अपने को पाक साफ कहने वाली भगवा पार्टी के समर्थक है, जिन पर इसी कॉलेज के कार्मिक रहे तकनीकी शिक्षा मंत्री के विशेषाधिकारी का हाथ बताया जा रहा है। हालांकि इन चर्चाओं में कितना दम है, इसका पता तो तब चले जब शिकायतों की निष्पक्ष तरीके से जांच हो और दोषियों को न केवल सजा मिले बल्कि करोड़ों रूपये के राजस्व नुकसान की वसूली भी हो।

*विज्ञापन या साक्षात्कार के बिना नियुक्त कर्मचारियों को नियमित नहीं किया जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय*

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि सार्वजनिक विज्ञापन या साक्षात्कार जैसी पारदर्शी चयन प्रक्रिया का पालन किए बिना तदर्थ या संविदा आधार पर नियुक्त सरकारी कर्मचारियों को राज्य नीतियों के तहत नियमित नहीं किया जा सकता है। यह फैसला 16 अप्रैल को न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ द्वारा मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुनाया गया।
न्यायालय ने हरियाणा सरकार द्वारा 2014 में जारी की गई दो अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया, जिनमें उन कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करने का प्रावधान था, जिन्होंने दस वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी या पूरी करने वाले थे। न्यायालय ने पाया कि राज्य सरकार विज्ञापन या साक्षात्कार के बिना की गई नियुक्तियों को उचित ठहराने में विफल रही है, जिससे ऐसी नियुक्तियों की वैधता और निष्पक्षता पर गंभीर संदेह पैदा होता है। पीठ ने कहा, "विज्ञापन के बिना नियुक्त होने का दावा ही नियुक्ति के तरीके पर संदेह पैदा करता है," और आगे कहा कि नियुक्ति के किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड का अभाव "ऐसी प्रक्रिया में विश्वास पैदा नहीं करता है।" हालांकि, न्यायालय ने इस व्यावहारिक वास्तविकता को भी स्वीकार किया कि ऐसे कई कर्मचारी एक दशक से अधिक समय से सेवा कर रहे थे और जीवन में स्थिर हो चुके थे। भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए, न्यायालय ने उन्हें सेवा में बने रहने की अनुमति दी, हालांकि उनके पदों के लिए लागू न्यूनतम वेतनमान पर। न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक पूर्व के फैसले को भी संशोधित किया, जिसने इसी तरह की नियमितीकरण नीतियों को रद्द कर दिया था। 2014 की दो अधिसूचनाओं को अमान्य घोषित कर दिया गया, जबकि जून 2014 में जारी की गई दो अन्य अधिसूचनाओं को वैध माना गया क्योंकि वे वैध भर्ती मानदंडों के अनुरूप पाई गई।
यह निर्णय इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि सार्वजनिक रोजगार को अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और पारदर्शिता की संवैधानिक आवश्यकताओं का सख्ती से पालन करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि सार्वजनिक पदों को गुप्त रूप से नहीं भरा जाए।
*दिया गया है कानूनी नोटिस*
उधर राजीव नगर निवासी राजूराम चौधरी ने हाईकोर्ट में एक वाद दायर कर विवि की इस प्रक्रिया पर सवाल उठाएं है, जिसके बाद उनके अधिवक्ता मुकुल कृष्ण व्यास की ओर से कानूनी नोटिस जारी कर विवि के संविधान के विरूद्व की जा रही इस प्रक्रिया का स्पष्टीकरण देने और विधिसम्मत कार्रवाई विवि को करने के लिये कहा है। प्रकरण के अनुसार 2004 में ईसीबी बीकानेर को विभाग की ओर से संविदा पर शैक्षणिक स्टाफ रखने के दिशा निर्देश दिए, जिनकी नियुक्ति अवधि भी तीन वर्ष तय की, जिसके बाद ईसीबी ने सहायक आचार्य पद पर विज्ञापन निकाल कर आवेदन मांगे। तय तिथि के उपरान्त करीब 35 जनों को सहायक आचार्य पद पर नियुक्ति संविदा पर दी गई और उनका कार्यकाल तीन वर्ष रखा गया। मजे की बात तो यह है कि 2009 को इन सभी सहायक आचार्यों का कार्यकाल समाप्त भी हो चुका है। उसके उपरान्त भी विवि की ओर से अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से सरकार को गलत तथ्य देकर करोड़ों रूपयों का चूना लगाया जा रहा है।

*ये है बोम बैठक का नियम*
पता चला है कि बोम में जिन एजेण्डों पर चर्चा होनी होती है, उनके बिन्दुओं को सात दिन पूर्व तय कर सदस्यों को भेज दिया जाता है लेकिन विवि प्रशासन ने अपात्र सहायक आचार्यों को परिलाभ देने के बिन्दु को इसमें शामिल ही नहीं किया। जब जनवरी में बैठक रखी गई, उसमें टेबल एजेण्डें के रूप में इस बिन्दु को शामिल कर अपात्रों को लाभ का प्रयास किया किन्तु रजिस्ट्रार की ओर से आपति दर्ज करवाने पर मामला अटक गया। रजिस्ट्रार ने तर्क दिया कि संविदा वालों और लंबित कानूनी प्रक्रिया वालों को इसका लाभ देना संवैधानिक नहीं है, जिसके बाद इसको लेकर पेच फंस गया और अब रजिस्ट्रार पर दबाव बनाकर अपात्रों को लाभ देने की तैयारी की जा रही है।

*अन्य कार्मिकों को पीएफ नहीं, अपात्रों को पदोन्नति*

हैरत वाली बात तो यह है कि अन्य संविदा पर लगे अशैक्षणिक कर्मचारियों को विवि प्रशासन की ओर से पीएफ का लाभ नहीं दिया जा रहा है और अपात्रों को पदोन्नति की जल्दबाजी कर रहा है। मंजर यह है कि अनेक बार अशैक्षणिक कर्मचारी अपनी गुहार विवि प्रशासन को लगा चुके है किन्तु उनके वेतन और पीएफ को लेकर विवि प्रशासन गंभीरता नहीं दिखा रहा बल्कि अपात्रों के प्रति मेहरबान है।

*क्या कहता है नियम*
नियमनुसार किसी भी प्रबंध बैठक के सभी प्रमुख मुद्दे, बैठक से पहले ही सभी सदस्यों को भेजे जाते हैं। किसी भी विश्वविद्यालय के व्याख्याताओं को प्रमोशन देना भी एक प्रमुख आइटम था, यह जानते हुए भी कुलपति ने यह मुद्दा आखिरी समय में टेबल एजेंडा में रखते हुए उन व्याख्याताओं को प्रमोशन का लाभ दे दिया, जिनकी नियुक्ति ही 3 साल के अनुबंध पर थी और कुछ व्याख्याताओं की नियुक्ति 2013 में एंटी करप्शन ब्यूरो बीकानेर में एफआईआर दर्ज होते हुए 2015 में तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा अभियोजन स्वीकृति जारी हो चुकी हैं।मामला यह हैं कि तकनीकी शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार ‌द्वारा जारी आदेश क्रमांक प.20 (2) त.शि./2003 जयपुर 25 अगस्त 2004 के तहत 3 साल की अनुबंध पर नियुक्ति करने की अनुमति प्रदान की गई थी।तकनीकी शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा जारी आदेश के तहत अभियांत्रिकी महावि‌द्यालय बीकानेर ‌द्वारा दिनांक 08.07.2005 को विज्ञापन जारी कर उक्त कार्मिकों का 3 साल के अनुबंध पर चयन किया गया था, जिस में अभियांत्रिकी महाविद्यालय बीकानेर में सन 2005 एवं 2006 में अनुबंध के आधार पर व्याख्याताओं की 3 साल के लिए नियुक्ति की गई थी। उस अनुबंध को महावि‌द्यालय एवं सरकार ने 3 साल के बाद आगे नहीं बढ़ाया, जिस के कारण यह अनुबंध स्वत: ही खारिज हो गया। खारिज अनुबंध के उपरांत भी अनुबंधित शैक्षणिक कर्मचारियों को आज दिनांक तक नियमित शैक्षणिक कर्मचारियों की तरह पूर्ण वेतनमान एवं सभी वित्तीय लाभ दिए जा रहे हैं। यही नहीं राज्य सरकार द्वारा वेतन मद में अभियांत्रिकी महावि‌द्यालय बीकानेर को एवं अनुबंधात्मक व्याख्याताओं को वेतन मद से दी जा रही ब्लॉक ग्रांट का महावि‌द्यालय ‌द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। यही नहीं, संघटक कॉलेज यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग-टेक्नोलॉजी, कॉलेज के ऐसे शिक्षकों को पदोन्नति का लाभ दे दिया है, जिनकी वर्तमान में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो बीकानेर में मुकदमा दर्ज है (एफआईआर 32/2014,35/2014) मुकदमा ही नहीं, इन शिक्षकों की तकनीकी शिक्षा विभाग दुवारा अभियोजन स्वीकृति भी हो चुकी है। इस मामले को लेकर स्थानीय निधि अनक्येशन विभाग ने इस का ऑडिट का पैरा भी बनाया और रिकवरी के आदेश भी दिए हैं, जो आज दिनाक तक अमल में नहीं लाया गया हैं।

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