अफसरशाही व विधायिका में टकराव, चिंताजनक स्थिति

AYUSH ANTIMA
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भारत में अफसरशाही व विधायिका के बीच टकराव लोकतंत्रिक व्यवस्था की एक जटिल समस्या है। यह टकराव मूलरुप से नीति निर्धारण (विधायिका) और नीति कार्यान्वयन (अफसरशाही) के बीच सामंजस्य की कमी के कारण होता है। इस टकराव में नेता चाहते हैं कि अफसर उनके प्रति जवाबदेह हो, जबकि अफसर नियमों में बंधे रहने का हवाला देते हैं। राजनेता जनता की उम्मीद के कारण त्वरित कार्रवाई चाहते हैं जबकि प्रशासनिक प्रक्रिया में समय लगता है। इस तरह के टकराव से जनता के काम प्रभावित होते हैं, फाईलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी होती है और प्रशासन शिथिल पड़ जाता है, जिससे विकास की गति धीमी पड़ जाती है। राजस्थान में जब से भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार का गठन हुआ है, अफसरशाही हावी होने की खबरें आती रही है। आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र): ने भी अपने लेखों के द्वारा इस समस्या को लेकर सरकार का ध्यान खीचने की कोशिश की थी, जब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सरकार पर अफसरशाही हावी होने को लेकर बहुत कड़ा बयान जारी किया था। तत्कालीन प्रमुख सचिव सुधांश पंत तो राजस्थान में सुपर सीएम की तरह काम कर रहे थे। विधायकों ने यहां तक कहा कि भजन लाल शर्मा सरकार के मंत्री भी इस समस्या से ग्रसित थे। भजन लाल शर्मा ने तो भाजपा कार्यकर्ताओं को नसीहत भी दी थी कि यह मत कहो कि हमारे काम नहीं हो रहे लेकिन जब विधायको के ही काम नहीं हो रहे तो आम कार्यकर्ता का काम नही होने का आलाप सही है लेकिन श्रीगंगानगर के प्रकरण ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, विधायको व आयुष अंतिमा के लेखों पर मुहर लगाने का काम किया है। राजस्थान के श्रीगंगानगर के विधायक के साथ जनसुनवाई के दौरान हंगामे की स्थिति बन गई, जहां विधायक के साथ मारपीट की खबरें आ रही है। विधायक ने दावा किया कि राजस्थान शहरी बुनियादी ढांचा विकास परियोजना के सहायक अभियंता ने दो अन्य लोगों के साथ मिलकर हमले को अंजाम दिया। यह जनसुनवाई शहर के कई इलाकों के पेयजल की समस्या को लेकर आयोजित की गई थी। इस प्रकरण पर दोनों तरफ से मारपीट की बाते हो रही है, जो जांच का विषय है लेकिन यह घटना भजन लाल शर्मा सरकार की साख पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है। जब सत्ता पक्ष का विधायक ही सुरक्षित नहीं तो आम आदमी के लिए बात करना बेमानी होगा। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन व सामंजस्य की आवश्यकता है। जहां विधायिका को नीतिगत दिशा देनी चाहिए, वहीं नौकरशाही को निष्पक्ष रूप से इनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।

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