राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उमाशंकर व्यास की पीठ द्वारा सुनाया गया यह ताजा फैसला मुख्यमंत्री के कथित साले प्रमोद शर्मा के लिए एक बड़ी कानूनी बाधा बनकर सामने आया है। दरअसल, यह पूरा प्रकरण उस समय निर्णायक मोड़ पर आ गया, जब न्यायालय ने प्रमोद शर्मा द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत दायर उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। इस याचिका में प्रमोद ने अपने विरुद्ध दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की गुहार लगाई थी। करीब सवा घंटे तक चली इस मैराथन बहस में कानून के विभिन्न पहलुओं पर तीखी जिरह हुई, लेकिन अंततः अदालत ने मामले के तथ्यों और इसकी प्रकृति को देखते हुए जांच में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। इस अदालती कार्यवाही की महत्ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार ने अपनी ओर से पक्ष रखने के लिए स्वयं महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद को मैदान में उतारा, जिन्होंने सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त मंशा को स्पष्ट किया। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता स्वदीप होरा ने अपनी दलीलों से एफआईआर की वैधता को चुनौती दी, जिसका प्रतिवाद शिकायतकर्ता घनश्याम शर्मा के अधिवक्ता माधव मित्र ने बेहद मजबूती से किया। न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद अब कानूनी गलियारों में हलचल तेज है। याचिका खारिज होने का सीधा अर्थ यह है कि अब पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों के लिए प्रमोद शर्मा के विरुद्ध कार्रवाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है। ऐसे में यह संभावना प्रबल हो गई है कि आने वाले दिनों में जांच का शिकंजा और अधिक कसेगा, जिससे बचने के लिए अब प्रमोद शर्मा के पास सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाने के अतिरिक्त अन्य कोई प्रभावी विधिक विकल्प शेष नहीं रह गया है।
*महेश झालानी*
वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर