पुलिस अधिकारी संजय शर्मा को प्रमोद की वजह से जयपुर छोड़ जाना पड़ा बीकानेर

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान की सत्ता के गलियारों में पिछले ढाई वर्षों से एक ऐसा 'अदृश्य साम्राज्य' फल-फूल रहा था, जिसके पास न तो कोई संवैधानिक पद था और न ही कोई आधिकारिक जवाबदेही, फिर भी उसका रसूख किसी समानांतर सरकार से कम नहीं जान पड़ता था। प्रमोद शर्मा नाम की यह पहेली उस वक्त एक हकीकत बनकर उभरी, जब मुख्यमंत्री के रूप में भजन लाल शर्मा के नाम की घोषणा हुई और प्रमोद ने एक चतुर रणनीतिकार की तरह टीवी इंटरव्यू के जरिए खुद को "सीएम का साला" प्रचारित कर दिया। सत्ता के साथ इस कथित रिश्तेदारी के दावे ने उसे रातों-रात एक ऐसे शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया, जहाँ से नेटवर्किंग और अनौपचारिक सत्ता का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ। प्रमोद की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता उसका आत्म-प्रोजेक्शन और वो व्यवहारिक कौशल था, जिसमें वह अत्यंत विनम्रता और शालीनता की ओट लेकर सामने वाले को 'शीशे में उतारने' की अद्भुत क्षमता रखता था। इसी शिष्टाचार के दम पर उसने अपना प्रभाव प्रशासनिक और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर फैलाया और यह धारणा पुख्ता कर दी कि आगामी निकाय चुनावों में टिकटों की चाबी उसी के पास होगी, जिसके बाद टिकटार्थियों की कतारें उसके दरवाजे पर दस्तक देने लगीं। ​सत्ता का यह मोहजाल इतना गहरा था कि जो अधिकारी लंबे समय से हाशिए पर पड़े थे, वे बेहतर पोस्टिंग की चाहत में उसके इर्द-गिर्द जमा होने लगे। प्रभाव का यह गुब्बारा तब फटना शुरू हुआ, जब जुलाई 2025 में एक जमीन विवाद के मामले में उसके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसा। सीएमओ में तैनात आईजी गौरव श्रीवास्तव के तबादले के बाद भले ही इस केस में एफआर लगाने का षड्यंत्र रचा गया हो, लेकिन डीसीपी की तत्परता की वजह से एफआर कटने से बच गई। प्रमोद मुख्यमंत्री के नाम का दुरुपयोग कर बाड़मेर क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष बन गया। यह मामला सीएमओ में पहुँचते ही सिस्टम ने अपनी मंशा साफ कर दी और प्रमोद को न केवल इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि उसे अध्यक्ष बनाने में सक्रिय भूमिका अदा करने वाले खेल अधिकारी को बाड़मेर से उठाकर धौलपुर फेंक दिया गया। उधर प्रमोद के साथ जमीन के कारोबार में कंधे से कंधा मिलाने वाले पुलिस अधिकारी संजय शर्मा जैसे किरदारों को भी जयपुर के मानसरोवर से हटाकर बीकानेर आरएसी जैसे दूरस्थ इलाकों में भेज दिया गया। वर्तमान में यह प्रकरण केवल तबादलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की नजरें उसके माइंस और क्रेशर कारोबार पर टिक गई हैं। नारायण विहार से लेकर सिद्धार्थ नगर तक जिस संजय शर्मा और प्रमोद शर्मा की तूती बोलती थी, आज उनके द्वारा किए गए जमीनों के घपलों की परतें खुल रही हैं। हकीकत यह है कि गांव बदरवास की जिस जमीन को लेकर पूर्व विधायक स्व.शिवराम शर्मा के पुत्र घनश्याम शर्मा ने एफआईआर दर्ज कराई थी, उसमें प्रमोद मुख्य आरोपी भले न हो, लेकिन जांच अब भी पूरी शिद्दत से जारी है। जिस एफआर की चर्चा की जा रही थी, वह असल में लगी नहीं थी। एफआर अंतिम पड़ाव पर थी, जिसे अब पुलिस की सक्रियता ने पुनर्जीवित कर दिया है। ​अंदरखाने की खबर यह है कि सीएमओ की नजर अब प्रमोद, संजय शर्मा और उनके साथ जुड़े एक छात्र नेता की त्रिकोणीय गतिविधियों पर है। जैसे-जैसे सत्ता का संरक्षण छिन रहा है, वे लोग भी अब लामबंद होकर एफआईआर दर्ज कराने की योजना बना रहे हैं, जो इस सिंडिकेट का शिकार हुए थे। पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए तलब किए जाने और गिरफ्तारी के बाद 'थर्ड डिग्री' के खौफ ने अब उस 'प्रभावशाली चेहरे' को भूमिगत होने पर मजबूर कर दिया है, जो कभी सत्ता की परछाई बनकर राज करता था, एक प्रभावशाली छात्र नेता भी रडार पर है। प्रमोद शर्मा का यह प्रकरण एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक उदासीनता मिलकर एक अनौपचारिक सत्ता खड़ी कर देती है, लेकिन जब तंत्र अपनी गरिमा की रक्षा के लिए जागता है, तो ऐसे साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं। सवाल अब भी वही है कि क्या यह कार्रवाई भविष्य की ऐसी अदृश्य ताकतों के लिए एक स्थायी सबक बनेगी।

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