कैंसर अस्पताल के निदेशक पर मनमानी का आरोप, कर रही नियमों की अवहेलना

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर: पीबीएम में अनेक अनियमितताओं के बीच आचार्य तुलसी कैंसर रिसर्च अस्पताल में भी गड़बड़झाले की खबर सामने आ रही है, जिसकी शिकायत स्थानीय जनप्रनिनिधियों से लेकर सीएमओ व चिकित्सा मंत्री तक की गई है। बताया जा रहा है कि कैंसर अस्पताल की निदेशक द्वारा निजी हित व अपने चेहतों को व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से राजकीय नियमों को धता बताकर नियुक्तियां दी गई है, जिससे प्रतिमाह वेतन के रूप में राजस्व को नुकसान पहुंच रहा है। सूत्रों के हवाले से मिली खबर में पता चला है कि कैंसर अस्पताल की निदेशक नीति शर्मा पद का दुरूपयोग कर बिना प्रशासनिक स्वीकृतियों के कई कार्मिकों पर मेहरबान बनी हुई है। जानकारी मिली है कि भारत सरकार द्वारा संचालित आईसीएमआर योजना में प्रवीण सोनी नाम के कार्मिक को बतौर डाटा एंट्री ऑपरेटर संविदा पर लगाया गया था लेकिन प्रवीण सोनी को अब निदेशक ने अपना निजी सहायक के पद पर लगा दिया है, जो इस संस्था में स्वीकृत पद भी नहीं है। मजे की बात तो यह है कि इसके लिये नीति शर्मा द्वारा न तो पीबीएम प्रशासन और न ही मेडिकल कॉलेज प्रशासन से किसी प्रकार की स्वीकृति ली है। इतना ही नहीं राजकीय नियमों की बात करें तो नियमानुसार निदेशक को निजी सहायक रखने का प्रावधान तक नहीं है। सूत्र बताते है कि सोनी निदेशक के कमरे के पास नहीं बल्कि अस्पताल के कमरा नंबर 13 में बैठकर अस्पताल कार्य समय में अन्य कामकाज करता है। 

*सेवानिवृत्त कार्मिक को आदेशों के विपरीत दे रखी है नियुक्ति*

जानकारी में ऐसा भी सामने आ रहा है कि 67 वर्षीय देवकिशन गहलोत नाम के सेवानिवृत्त कार्मिक को भी निदेशक ने नियुक्ति दे रखी है, जबकि शासन सचिव कार्मिक के नियमानुसार 65 वर्ष की आयु के बाद किसी भी कार्मिक को पुन: नियुक्ति नहीं दी जा सकती। यहीं नहीं संविदा पुनर्नियुक्ति के आधार पर लगे व्यक्ति से गोपनीय, संवेदनशील प्रकृति के कार्य, नकदी लेन-देन, चैक बुक लिखना, रोकड़ बही लिखना और रोकडिय़ा इत्यादि का कार्य नहीं करवाया जा सकता। उसके बाद भी निदेशक की ओर से देवकिशन गहलोत को रोकडपाल के रूप में कार्य करवाकर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। 

*फर्जी तरीके से लगाएं डाटा एंट्री ऑपरेटर-अटेंडेन्ट*

मजे की बात तो यह है कि अस्पताल में डाटा एंट्री आपरेटर का पद स्वीकृत नहीं है। उसके बाद भी दीपिका भोजक नाम की कार्मिक को इस पद पर लगाया गया। जबकि दीपिका से संबंधित कार्य ही नहीं करवाकर महज प्रतिमाह 14 हजार का वेतन दो वर्षों तक देकर धन का अपव्यय किया। जब इसकी शिकायत हुई तो दीपिका को एक प्राइवेट एनजीओ के जरिये अस्पताल में बरकरार रखकर कामकाज करवाकर अस्पताल की गोयनीयता को भंग किया जा रहा है। इतना ही नहीं शबाना नामक कार्मिक को भी अटेंडेन्ट पद पर नियुक्ति देकर उक्त कार्य नहीं करवाया जा रहा है और अनावश्यक वेतन दिया जा रहा है। 

*संभागीय आयुक्त के आदेश भी हवा*

गौर करने वाली बात तो यह है कि जनवरी 26 में संभागीय आयुक्त को मिली शिकायतों के बाद इस भ्रष्टाचार पर नियमानुसार कार्यवाही करने के निर्देश निदेशक नीति शर्मा को दिए गये। किन्तु आज दिनांक तक निदेशक ने किसी भी प्रकार की कार्यवाही न कर अस्पताल में हो रहे भ्रष्टाचार पर मुहर लगा दी।

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